Haryana Board (HBSE) Class 12 Business Studies Question Paper 2024 Answer Key. BSEH (Board of School Education Haryana) Class 12 Business Studies Answer Key 2024. HBSE (Haryana Board of School Education) Class 12 Business Studies Solved Question Paper 2024. BSEH Class 12 Business Studies Paper 2024 Solution. Download PDF and check accurate answers carefully prepared through my personal understanding, subject knowledge, and dedication to help students based on the syllabus and exam pattern.
HBSE Class 12 Business Studies Question Paper 2024 Answer Key
1. मनोज ने भारत टेक्सटाइल कंपनी के 100 अंश, 100 रुपये प्रति अंश की दर से खरीदे। कुछ समय बाद अंशों का बाजार मूल्य 120 रुपये हो जाता है। मनोज की, कंपनी में संपदा कितनी होगी?
(A) 12,000 रुपये
(B) 8,000 रुपये
(C) 10,000 रुपये
(D) 10,120 रुपये
उत्तर – (A) 12,000 रुपये
कुल संपदा = कुल अंश संख्या × वर्तमान बाजार मूल्य कुल = 100 × 120 = 12,000 रुपये
2. ‘बाजार में फोटोस्टेट मशीनें आने से कार्बन पेपर व्यवसाय पर विपरीत प्रभाव पड़ना’, किस वातावरणीय घटक का परिणाम है?
(A) आर्थिक
(B) राजनैतिक
(C) तकनीकी
(D) उपरोक्त सभी
उत्तर – (C) तकनीकी
3. अल्फा प्राइवेट लिमिटेड के विपणन प्रबंधक श्री दयाल जब निर्णय लेते हैं तब वह शीर्ष पर रखते हैं कि किस वस्तु का उत्पादन किया जाएगा, उसकी क्या विशेषताएँ होंगी और कितने मूल्य पर उसे बेचा जाएगा तथा वह वस्तु विक्रय के लिए कहाँ उपलब्ध कराई जाएगी। यह सब इस बात पर निर्भर करेगा कि ग्राहक क्या चाहते हैं? माना ग्राहक कार में बच्चों के बैठने के लिए अलग से सीट चाहते हैं, तो निर्माता इसका ध्यान रखकर कार बनाएगा और उसका उतना मूल्य रखेगा जितना क्रेता देना चाहता है। उस विपणन दर्शन को पहचानिए जिसका श्री दयाल अनुसरण करते हैं :
(A) विपणन विचारधारा
(B) बिक्री विचारधारा
(C) उत्पाद विचारधारा
(D) उत्पादन विचारधारा
उत्तर – (A) विपणन विचारधारा
4. “कारखाने में धूम्रपान करना वर्जित है।” यह योजना का कौन-सा प्रकार है?
(A) नियम
(B) नीतियाँ
(C) उद्देश्य
(D) कार्यक्रम
उत्तर – (A) नियम
5. निर्देशन प्रबंध प्रक्रिया का …………… चरण है।
(A) पहला
(B) दूसरा
(C) तीसरा
(D) चौथा
उत्तर – (D) चौथा
प्रबंध प्रक्रिया के चरण : योजनाबद्ध करना (Planning), संगठन करना (Organising), नियोजन/स्टाफिंग (Staffing), निर्देशन (Directing), नियंत्रण (Controlling)
6. “परिवर्तन बहुत जल्दी-जल्दी हो रहे हैं और भविष्य की भविष्यवाणी करना मुश्किल है।” व्यावसायिक वातावरण की किस विशेषता पर प्रकाश डाला गया है?
(A) अनिश्चितता
(B) जटिलता
(C) अंतर-संबद्धता
(D) सापेक्षता
उत्तर – (A) अनिश्चितता
7. यदि चालू संपत्तियाँ 5,00,000 रुपये और चालू दायित्व 3,50,000 रुपये हों, तो शुद्ध कार्यशील पूँजी की राशि होगी :
(A) 5,00,000 रुपये
(B) 3,50,000 रुपये
(C) 1,50,000 रुपये
(D) 8,50,000 रुपये
उत्तर – (C) 1,50,000 रुपये
शुद्ध कार्यशील पूँजी (Net Working Capital) = चालू संपत्तियाँ – चालू दायित्व = 5,00,000 – 3,50,000 = 1,50,000 रुपये
8. चयन प्रक्रिया का दूसरा चरण कौन-सा है?
(A) प्राथमिक जाँच
(B) चयन परीक्षाएँ
(C) पद प्रस्ताव
(D) चयन निर्णय
उत्तर – (B) चयन परीक्षाएँ
चयन प्रक्रिया (Selection Process) के सामान्य चरण : प्राथमिक जाँच (Preliminary Screening), चयन परीक्षाएँ (Selection Tests), साक्षात्कार (Employment Interview), संदर्भ जाँच (Reference Check), चिकित्सा परीक्षण (Medical Examination), चयन निर्णय (Selection Decision), पद प्रस्ताव (Job Offer), नियुक्ति (Appointment)
9. अभिकथन (A) : नियंत्रण की आवश्यकता केवल व्यावसायिक संगठनों में होती है।
कारण (R) : नियंत्रण एक सर्वव्यापी कार्य नहीं है।
(A) अभिकथन (A) व कारण (R) दोनों सत्य हैं और कारण (R), अभिकथन (A) की सही व्याख्या है।
(B) अभिकथन (A) व कारण (R) दोनों सत्य हैं और कारण (R), अभिकथन (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(C) अभिकथन (A) सत्य है, लेकिन कारण (R) असत्य है।
(D) अभिकथन (A) व कारण (R) दोनों असत्य हैं।
उत्तर – (D) अभिकथन (A) व कारण (R) दोनों असत्य हैं।
10. अभिकथन (A) : किसी भी व्यवसाय के दीर्घकालीन विनियोग निर्णय बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं।
कारण (R) : दीर्घकालीन विनियोग निर्णय दीर्घकाल में व्यवसाय की लाभदायक क्षमता को प्रभावित करते हैं।
(A) अभिकथन (A) व कारण (R) दोनों सत्य हैं और कारण (R), अभिकथन (A) की सही व्याख्या है।
(B) अभिकथन (A) व कारण (R) दोनों सत्य हैं और कारण (R), अभिकथन (A) की सही व्याख्या नहीं है।
(C) अभिकथन (A) सत्य है, लेकिन कारण (R) असत्य है।
(D) अभिकथन (A) व कारण (R) दोनों असत्य हैं।
उत्तर – (A) अभिकथन (A) व कारण (R) दोनों सत्य हैं और कारण (R), अभिकथन (A) की सही व्याख्या है।
11. पैकेजिंग के कितने स्तर होते हैं?
उत्तर – पैकेजिंग के तीन स्तर होते हैं : प्राथमिक पैकेजिंग, द्वितीयक पैकेजिंग, तृतीयक पैकेजिंग
12. आभूषण की गुणवत्ता को जाँचने के लिए किस प्रमाप को ध्यान में रखना चाहिए?
उत्तर – BIS हॉलमार्क
13. प्रबंध के किस स्तर पर नीतियाँ बनाई जाती हैं?
उत्तर – शीर्ष स्तर
14. ऋण समता अनुपात के बारे में निर्णय लेते समय सामान्यतः अंशों की तुलना में …………… सस्ते माने जाते हैं। (ऋण पत्र / बॉण्ड)
उत्तर – ऋण पत्र
15. राज्य कमीशन में …………… तक के मूल्य के विवादों से संबंधित शिकायतों का समाधान किया जाता है। (5 करोड़ / 10 करोड़)
उत्तर – 5 करोड़
16. ……………. ज्ञान का एक क्रमबद्ध समूह है और इसकी वैधता सार्वभौमिक है। (विज्ञान / कला)
उत्तर – विज्ञान
17. भारत सरकार ने …………… नवम्बर, 2016 को एक घोषणा की थी जिसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ा। (8 / 18)
उत्तर – 8
18. व्यावसायिक वातावरण की विशेष शक्तियों में निवेशक, ग्राहक, प्रतियोगी एवं पूर्तिकर्ता सम्मिलित होते हैं। (सही / गलत)
उत्तर – सही
19. प्रचार, संवर्धन का भुगतान किए जाने वाला प्रारूप है। (सही / गलत)
उत्तर – सही
20. ‘भवन का किराया’ स्थायी वित्तीय लागतों का एक उदाहरण है। (सही / गलत)
उत्तर – सही
21. समता पर व्यापार को एक उदाहरण की सहायता से समझाइए।
उत्तर – समता पर व्यापार (Trading on Equity) : समता पर व्यापार का मतलब है कंपनी अपने शेयरधारकों की पूँजी के साथ उधारी का उपयोग करके अधिक लाभ कमाती है। यदि कुल पूँजी पर लाभ उधारी के ब्याज से अधिक हो, तो शेयरधारकों का लाभ बढ़ जाता है।
उदाहरण :
शेयरधारकों की पूँजी = ₹10,00,000
ऋण = ₹5,00,000 पर 10% ब्याज
कुल लाभ = 15% × ₹15,00,000 = ₹2,25,000
ब्याज = ₹50,000
शेयरधारकों का शुद्ध लाभ = ₹1,75,000 → ROE = 17.5%
निष्कर्ष: ऋण लेने से शेयरधारकों का लाभ बढ़ गया। यही समता पर व्यापार है।
22. अधिकार अंतरण के तत्त्वों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर – अधिकार अंतरण (Delegation of Authority) के तत्त्व :
(i) कार्य सौंपना (Delegation of Duty) – सबसे पहले वरिष्ठ अधिकारी किसी अधीनस्थ को विशेष कार्य या जिम्मेदारी सौंपता है। यह सुनिश्चित करता है कि कार्य ठीक समय पर और सही तरीके से पूरा हो।
(ii) अधिकार प्रदान करना (Granting Authority) – कार्य को करने के लिए अधीनस्थ को आवश्यक अधिकार या शक्ति दी जाती है। अधिकार के बिना कार्य करना संभव नहीं होता।
(iii) जवाबदेही तय करना (Fixing Accountability) – अधीनस्थ को कार्य पूरा करने के लिए उत्तरदायी माना जाता है। जवाबदेही तय होने से कार्य के प्रति जिम्मेदारी का भाव विकसित होता है।
23. उदाहरण की सहायता से वित्तीय प्रोत्साहन को समझाइए।
उत्तर – वित्तीय प्रोत्साहन (Financial Incentive) वह आर्थिक लाभ या पुरस्कार है जो किसी व्यक्ति, कर्मचारी या संगठन को विशेष कार्य करने या बेहतर प्रदर्शन करने के लिए दिया जाता है। इसका उद्देश्य व्यक्ति को प्रेरित करना और उत्पादकता बढ़ाना होता है।
उदाहरण :
• प्रदर्शन बोनस : अगर किसी कर्मचारी ने अपने लक्ष्य हासिल कर लिए हैं, तो उसे अतिरिक्त पैसे का बोनस दिया जाता है। यह कर्मचारी को भविष्य में भी अच्छा प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करता है।
• बिक्री कमीशन : किसी सेल्स टीम को उनके द्वारा की गई बिक्री के आधार पर कमीशन मिलता है। जितनी ज़्यादा बिक्री होगी, उतना ज़्यादा कमीशन मिलेगा।
अथवा
उदाहरण की सहायता से गैर-वित्तीय प्रोत्साहन को समझाइए।
उत्तर – गैर-वित्तीय प्रोत्साहन (Non-Financial Incentive) वह प्रकार का प्रोत्साहन है जो कर्मचारियों या व्यक्तियों को आर्थिक लाभ के बिना दिया जाता है। इसका उद्देश्य उनकी मनोबल, संतुष्टि और काम में रुचि बढ़ाना होता है।
उदाहरण :
• सराहना और मान्यता : कर्मचारी के अच्छे काम के लिए उसकी प्रशंसा करना, किसी प्रदर्शन कार्यक्रम में उसे पुरस्कृत करना, या उसे सेवा प्रमाण पत्र देना।
• पदोन्नति : कर्मचारी की स्थिति में सुधार करना, जिससे उसे अधिक जिम्मेदारी और अधिकार मिलें।
• नौकरी संवर्धन : कर्मचारी को ऐसी भूमिका देना जिसमें अधिक ज्ञान, जिम्मेदारी और स्वायत्तता हो।
24. “विज्ञापन के लिए भुगतान करना लाभदायक है।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं? अपने उत्तर के समर्थन में कारण दीजिए।
उत्तर – हाँ, मैं इस कथन से सहमत हूँ कि “विज्ञापन के लिए भुगतान करना लाभदायक है।” इसका समर्थन कई कारणों से किया जा सकता है :
(i) ब्रांड की पहचान बढ़ती है – विज्ञापन से उत्पाद या सेवा के बारे में लोगों को जानकारी मिलती है। लोग आपके ब्रांड को पहचानते हैं और भरोसा करते हैं।
(ii) बिक्री में वृद्धि – अच्छे विज्ञापन से ग्राहकों की संख्या बढ़ती है और उत्पाद की बिक्री में सुधार होता है।
(iii) प्रतियोगिता में बढ़त – यदि प्रतिस्पर्धी अपने उत्पाद का प्रचार कर रहे हैं, तो विज्ञापन आपको बाजार में उनकी तुलना में आगे रखने में मदद करता है।
(iv) लक्षित ग्राहकों तक पहुँच – विज्ञापन की मदद से सही समय पर सही ग्राहकों तक संदेश पहुँचाया जा सकता है, जिससे निवेश पर अधिक लाभ मिलता है।
(v) नए उत्पादों का प्रचार – नए उत्पाद या सेवा को बाजार में पहचान दिलाने के लिए विज्ञापन सबसे प्रभावी तरीका है।
अथवा
विक्रय संवर्धन के तीन उदाहरण दीजिए।
उत्तर – विक्रय संवर्धन के तीन उदाहरण :
(i) छूट (Discount Offer) – ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए वस्तुओं पर विशेष छूट दी जाती है। जैसे – “खरीदो 1, पाओ 1 फ्री”, “20% की छूट” या “त्योहारी ऑफर”। इससे ग्राहक को कम दाम पर उत्पाद मिलता है और बिक्री में वृद्धि होती है।
(ii) उपहार योजना (Free Gifts / Prizes) – उपभोक्ता को वस्तु खरीदने पर अतिरिक्त उपहार दिया जाता है। उदाहरण के लिए टूथपेस्ट के साथ टूथब्रश फ्री, मोबाइल फोन खरीदने पर कवर या हेडफोन फ्री। ऐसी योजनाओं से उपभोक्ता को अतिरिक्त लाभ मिलता है और वह खरीदने के लिए प्रेरित होता है।
(iii) नमूना वितरण (Free Samples) – नए उत्पादों को लोकप्रिय बनाने के लिए कंपनियाँ ग्राहकों को मुफ्त नमूने देती हैं। जैसे नए बिस्कुट, साबुन, शैम्पू या सौंदर्य प्रसाधन के छोटे पैक। इससे उपभोक्ता बिना पैसे खर्च किए उत्पाद को आज़माता है और बाद में नियमित रूप से खरीदने लगता है।
25. संप्रेषण की बाधाओं को दूर करने के उपायों पर चर्चा करें।
उत्तर – संप्रेषण को प्रभावी बनाने और बाधाओं को दूर करने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं :
(i) स्पष्ट और सरल भाषा का प्रयोग – संदेश हमेशा सरल, संक्षिप्त और स्पष्ट भाषा में देना चाहिए ताकि सभी लोग उसे आसानी से समझ सकें और कोई भ्रम न रहे।
(ii) प्रतिक्रिया (Feedback) लेना – संदेश देने वाले को श्रोताओं से प्रतिक्रिया अवश्य लेनी चाहिए। प्रतिक्रिया से यह पता चलता है कि संदेश सही समझा गया है या नहीं।
(iii) उपयुक्त माध्यम का चयन – संप्रेषण के लिए परिस्थिति और श्रोताओं के अनुसार सही माध्यम (जैसे मौखिक, लिखित, ई-मेल, बैठक आदि) चुनना चाहिए। सही माध्यम से संदेश जल्दी और प्रभावी रूप से पहुँचता है।
(iv) भावनात्मक और व्यक्तिगत पक्षपात से बचना – संप्रेषण करते समय ग़ुस्सा, पूर्वाग्रह या व्यक्तिगत पक्षपात जैसी भावनाओं से बचना चाहिए। निष्पक्षता और सकारात्मक दृष्टिकोण से संदेश अधिक प्रभावी बनता है।
26. संगठन की प्रक्रिया को विस्तार से समझाइए।
उत्तर – संगठन की प्रक्रिया कुछ निश्चित चरणों में पूरी होती है। ये इस प्रकार हैं :
(i) उद्देश्यों का निर्धारण – संगठन की प्रक्रिया सबसे पहले स्पष्ट उद्देश्यों को तय करने से शुरू होती है। बिना लक्ष्य तय किए कार्यों को सही दिशा नहीं दी जा सकती। उदाहरण के लिए- कंपनी का उद्देश्य उत्पादन बढ़ाना, बिक्री बढ़ाना या लाभ कमाना हो सकता है।
(ii) गतिविधियों की पहचान – उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए किन-किन कार्यों या गतिविधियों को पूरा करना होगा, यह तय किया जाता है। जैसे- उत्पादन विभाग, विपणन विभाग, वित्त विभाग, मानव संसाधन विभाग आदि।
(iii) गतिविधियों का समूह बनाना – समान प्रकृति की गतिविधियों को एक समूह में रखकर विभाग बनाए जाते हैं। उदाहरण- सभी बिक्री संबंधी कार्यों को विपणन विभाग में और सभी उत्पादन संबंधी कार्यों को उत्पादन विभाग में रखा जाता है।
(iv) कार्य का आवंटन – अब प्रत्येक विभाग में अलग-अलग कर्मचारियों को उनकी क्षमता और योग्यता के अनुसार कार्य सौंपा जाता है। इससे जिम्मेदारी स्पष्ट हो जाती है और कोई कार्य अधूरा नहीं रहता।
(v) अधिकार और उत्तरदायित्व का निर्धारण – कर्मचारियों को केवल कार्य ही नहीं बल्कि उसे पूरा करने का अधिकार भी दिया जाता है। साथ ही यह भी तय होता है कि कार्य समय पर और सही ढंग से पूरा करना उनकी जिम्मेदारी है।
(vi) समन्वय और संबंध स्थापित करना – सभी विभागों और कर्मचारियों के बीच आपसी तालमेल और सहयोग होना आवश्यक है। इसके लिए संगठन में ऊपरी और निचले स्तर के बीच स्पष्ट आदेश और रिपोर्टिंग संबंध बनाए जाते हैं।
27. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के अनुसार, उपभोक्ताओं को उपलब्ध कोई चार राहत को समझाइए।
उत्तर – उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के अनुसार चार महत्त्वपूर्ण राहतें :
(i) वापसी और प्रतिस्थापन – यदि कोई उत्पाद दोषपूर्ण, खराब या असंतोषजनक निकले, तो उपभोक्ता उसे वापस करके उसका प्रतिस्थापन प्राप्त कर सकता है या अपने भुगतान की वापसी करवा सकता है। यह उपभोक्ता को सीधे लाभ और सुरक्षा प्रदान करता है।
(ii) मुआवजा – किसी उत्पाद या सेवा के कारण यदि उपभोक्ता को हानि, चोट या नुकसान हुआ हो, तो वह उपभोक्ता मुआवजा प्राप्त करने का अधिकार रखता है। इससे उपभोक्ता को न्याय और आर्थिक सुरक्षा मिलती है।
(iii) सेवा में सुधार – यदि किसी सेवा में कमी या दोष पाया जाए, जैसे बिजली, बैंक, टेलीफोन या स्वास्थ्य सेवाओं में गड़बड़ी, तो उपभोक्ता उसे सुधारने या ठीक करने की मांग कर सकता है। यह उपभोक्ता को गुणवत्तापूर्ण सेवा सुनिश्चित करता है।
(iv) सही जानकारी का अधिकार – उपभोक्ता को उत्पाद और सेवाओं के बारे में सटीक और पर्याप्त जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है, जैसे सामग्री, मूल्य, उपयोग विधि और चेतावनी। इससे उपभोक्ता अपने निर्णय सही ढंग से ले सकता है।
28. नियंत्रण की विशेषताओं की व्याख्या करें।
उत्तर – नियंत्रण की मुख्य विशेषताएँ :
(i) लक्ष्यपरक – नियंत्रण का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि संगठन की सभी गतिविधियाँ पहले से तय किए गए लक्ष्यों की दिशा में हो रही हैं। यह सुनिश्चित करता है कि संगठन अपने उद्देश्यों को प्रभावी ढंग से प्राप्त करे।
(ii) सतत प्रक्रिया – नियंत्रण एक निरंतर और लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। संगठन में समय-समय पर कार्यों, परिणामों और प्रदर्शन की समीक्षा होती रहती है ताकि किसी भी विचलन को तुरंत पहचाना जा सके।
(iii) मूल्यांकन और सुधार – नियंत्रण के माध्यम से कार्यों का मूल्यांकन तय मानकों के अनुसार किया जाता है। यदि कोई विचलन पाया जाए, तो उसे सुधारने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाते हैं। यह संगठन की कार्यक्षमता को बढ़ाता है।
(iv) संगठनात्मक ढाँचे पर आधारित – नियंत्रण संगठन की संरचना, अधिकार और जिम्मेदारियों के अनुसार लागू होता है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि प्रत्येक कर्मचारी अपनी भूमिका और जिम्मेदारी के अनुसार कार्य करे और संगठन के लक्ष्यों में योगदान दे।
(v) भविष्य की योजना में सहायता – नियंत्रण से मिलने वाली जानकारी और अनुभव भविष्य की योजनाओं और निर्णयों को सही ढंग से बनाने में मदद करता है। यह संगठन को सुधार और नवाचार के लिए तैयार रखता है।
29. ‘कार्यशील पूँजी’ को प्रभावित करने वाले तत्त्वों का वर्णन करें।
उत्तर – कार्यशील पूँजी को प्रभावित करने वाले तत्त्व :
(i) उत्पादन की मात्रा – यदि संगठन का उत्पादन अधिक है, तो कच्चा माल, अधूरा उत्पादन और तैयार माल की आवश्यकता बढ़ जाती है। इससे कार्यशील पूँजी की मांग भी बढ़ जाती है क्योंकि अधिक संसाधनों की जरूरत होती है।
(ii) विक्रय की मात्रा और नीति – बिक्री बढ़ने पर नकद की आवश्यकता बढ़ती है। यदि बिक्री उधारी पर होती है, तो नकद प्रवाह कम होगा और कार्यशील पूँजी पर दबाव पड़ेगा। वहीं, नकद बिक्री से कार्यशील पूँजी की उपलब्धता बढ़ती है।
(iii) भुगतान की शर्तें – ग्राहकों को लंबी अवधि के लिए उधार देने से नकद की उपलब्धता कम होती है। इसके विपरीत, सप्लायर्स से लंबी अवधि तक भुगतान करने पर संगठन के पास अधिक कार्यशील पूँजी उपलब्ध रहती है।
(iv) मौद्रिक और वित्तीय स्थिति – ब्याज दर, बैंकिंग प्रणाली की स्थिति, मुद्रा की उपलब्धता और आर्थिक परिस्थितियाँ कार्यशील पूँजी की मांग और उपलब्धता को प्रभावित करती हैं।
(v) मौसमी और व्यापारिक परिस्थितियाँ – कुछ व्यवसायों में मांग मौसम के अनुसार बदलती रहती है। जैसे त्योहारी सीजन में बिक्री बढ़ने से कार्यशील पूँजी की जरूरत भी बढ़ जाती है। इसके अलावा बाजार में मांग-सप्लाई की स्थिति भी पूँजी पर असर डालती है।
अथवा
‘स्थायी पूँजी’ को प्रभावित करने वाले तत्त्वों का वर्णन करें।
उत्तर – स्थायी पूँजी को प्रभावित करने वाले तत्त्व :
(i) उद्योग का प्रकार – जिस उद्योग में संगठन कार्य कर रहा है, उसकी प्रकृति स्थायी पूँजी की मांग को प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए, भारी उद्योग या निर्माण उद्योग में बड़ी मशीनरी, भूमि और भवन की जरूरत अधिक होती है, इसलिए स्थायी पूँजी की आवश्यकता अधिक होती है।
(ii) उद्योग का आकार – संगठन जितना बड़ा होगा और उतनी ही अधिक उत्पादन और संचालन की स्थायी जरूरतें होंगी। बड़े उद्योग को उपकरण, मशीनरी और फैक्ट्री भवन के लिए अधिक स्थायी पूँजी की आवश्यकता होती है।
(iii) व्यवसाय की प्रकृति और अवधि – यदि व्यवसाय लंबे समय तक चलने वाला है या इसमें दीर्घकालिक निवेश की आवश्यकता है, तो स्थायी पूँजी अधिक होगी। यह पूँजी संगठन को स्थिरता और दीर्घकालिक संचालन सुनिश्चित करती है।
(iv) मौद्रिक और वित्तीय स्थिति – ब्याज दर, बैंक ऋण की उपलब्धता और आर्थिक परिस्थितियाँ स्थायी पूँजी की उपलब्धता और लागत को प्रभावित करती हैं। कठिन वित्तीय परिस्थितियों में पूँजी जुटाना कठिन हो जाता है।
(v) व्यवसाय का विकास और विस्तार – भविष्य में विस्तार, नई परियोजनाएँ या उत्पादन क्षमता बढ़ाने की योजना होने पर अधिक स्थायी पूँजी की आवश्यकता होती है। यह सुनिश्चित करता है कि संगठन दीर्घकालिक लक्ष्यों को पूरा कर सके।
30. प्रबंध के कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर – प्रबंध के कार्य (Functions of Management) :
(i) योजना बनाना (Planning) – योजना बनाना भविष्य के लिए लक्ष्य निर्धारित करने और उन्हें प्राप्त करने के लिए रणनीति तैयार करने की प्रक्रिया है। यह प्रबंध का पहला और आधारभूत कार्य है, जो संगठन की दिशा तय करता है और संसाधनों के सही उपयोग को सुनिश्चित करता है।
(ii) संगठन बनाना (Organizing) – संगठन बनाना कार्यों, कर्मचारियों और संसाधनों का सुव्यवस्थित संयोजन है। इसमें कार्यों का विभाजन, विभागों का निर्माण और अधिकार एवं जिम्मेदारियों का निर्धारण शामिल होता है। यह सुनिश्चित करता है कि सभी संसाधन और लोग अपने कार्य कुशलता से करें।
(iii) निर्देशन (Directing / Leading) – निर्देशन का कार्य कर्मचारियों को प्रेरित करना, मार्गदर्शन देना और नेतृत्व करना है ताकि वे अपने कार्य सही ढंग से और समय पर पूरा करें। यह कार्य संगठन में अनुशासन बनाए रखने और कर्मचारियों की उत्पादकता बढ़ाने में मदद करता है।
(iv) नियंत्रण (Controlling) – नियंत्रण यह सुनिश्चित करता है कि सभी कार्य निर्धारित मानकों और लक्ष्यों के अनुसार हों। इसमें कार्यों का मूल्यांकन, प्रदर्शन की समीक्षा और किसी भी विचलन की पहचान करके सुधारात्मक कदम उठाना शामिल है। इससे संगठन की कार्यक्षमता और गुणवत्ता बनी रहती है।
(v) निर्णय लेना (Decision Making) – निर्णय लेना संगठन की समस्याओं का समाधान करना और भविष्य की योजनाओं के लिए सही विकल्प चुनना है। यह प्रबंध का महत्वपूर्ण कार्य है, जो संगठन को अनिश्चितताओं और चुनौतियों का सामना करने में सक्षम बनाता है।
अथवा
प्रबंध के उद्देश्यों को समझाइए।
उत्तर – प्रबंध का मुख्य उद्देश्य संगठन के संसाधनों का सही और प्रभावी उपयोग करके संगठन के लक्ष्यों को प्राप्त करना है। इसके मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं :
(i) संगठन के लक्ष्य प्राप्त करना – प्रबंध यह सुनिश्चित करता है कि संगठन अपने निर्धारित लक्ष्यों को समय पर और प्रभावी तरीके से प्राप्त करे। सभी गतिविधियाँ और प्रयास संगठन की दिशा में संगठित होते हैं, ताकि लक्ष्य सफलता पूर्वक पूरे हो सकें।
(ii) संसाधनों का सही उपयोग – इसमें मानव, भौतिक, वित्तीय और प्राकृतिक संसाधनों का कुशल और व्यवस्थित उपयोग शामिल है। इसका उद्देश्य अपव्यय को कम करना और संसाधनों से अधिकतम लाभ प्राप्त करना है।
(iii) कार्य कुशलता और उत्पादकता बढ़ाना – प्रबंध के माध्यम से कार्यों का सही और सुव्यवस्थित संचालन सुनिश्चित किया जाता है। इसके द्वारा कर्मचारियों की उत्पादकता बढ़ती है और संगठन की कुल कार्यक्षमता में सुधार होता है।
(iv) निर्णय लेना और समस्याओं का समाधान करना – संगठन में आने वाली समस्याओं का समय पर समाधान करना और सही निर्णय लेना प्रबंध का महत्वपूर्ण उद्देश्य है। यह संगठन को अनिश्चितताओं और चुनौतियों का सामना करने में सक्षम बनाता है।
31. भर्ती के तीन आंतरिक व तीन बाह्य स्रोतों का वर्णन करें।
उत्तर – भर्ती के आंतरिक स्रोत :
(i) पदोन्नति (Promotion) – संगठन में मौजूदा कर्मचारियों को उनके अनुभव, योग्यता और प्रदर्शन के आधार पर उच्च पद पर पदोन्नत किया जाता है। इससे कर्मचारियों का मनोबल बढ़ता है और उन्हें अपने प्रयासों का पुरस्कृत अनुभव मिलता है। साथ ही, संगठन अनुभवी और योग्य कर्मचारियों के माध्यम से स्थिरता बनाए रख सकता है।
(ii) स्थानांतरण (Transfer) – कर्मचारियों को उनके कौशल और संगठन की जरूरत के अनुसार एक विभाग या शाखा से दूसरे में स्थानांतरित किया जाता है। यह संगठन में कार्य भार और विशेषज्ञता का संतुलन बनाए रखने में मदद करता है और कर्मचारियों को विभिन्न विभागों का अनुभव प्राप्त होता है।
(iii) आंतरिक आवेदन / कर्मचारी संदर्भ – मौजूदा कर्मचारियों से खाली पदों के लिए आवेदन मंगवाना। इससे भरोसेमंद और योग्य उम्मीदवार मिलते हैं, भर्ती प्रक्रिया तेज होती है, और संगठन के वातावरण में विश्वास और सहयोग बढ़ता है।
भर्ती के बाह्य स्रोत :
(i) नौकरी विज्ञापन – अखबार, जॉब पोर्टल या सोशल मीडिया के माध्यम से खाली पदों के लिए विज्ञापन देना। यह अधिक उम्मीदवारों तक पहुँचने और योग्य कर्मचारी खोजने का आसान तरीका है। साथ ही, इससे संगठन का ब्रांड भी मजबूत होता है और प्रतिभाशाली उम्मीदवार आकर्षित होते हैं।
(ii) शैक्षणिक संस्थान – कॉलेज, विश्वविद्यालय और प्रशिक्षण संस्थानों से नए और योग्य उम्मीदवारों की भर्ती। यह संगठन को युवा, प्रशिक्षित और नवीन विचारों वाले कर्मचारियों तक पहुँचाने में मदद करता है, जिससे संगठन की विकास क्षमता बढ़ती है।
(iii) रोज़गार कार्यालय और निजी भर्ती एजेंसियाँ – सरकारी रोजगार कार्यालय और निजी एजेंसियों के माध्यम से उम्मीदवारों का चयन करना। यह समय और प्रयास बचाने का प्रभावी तरीका है और संगठन को आवश्यक योग्यता वाले उम्मीदवार जल्दी मिल जाते हैं।
32. विपणन मिश्रण के तत्त्वों की चर्चा करें।
उत्तर – विपणन मिश्रण के 4 P (उत्पाद, मूल्य, स्थान, प्रचार) :
(i) उत्पाद (Product) – उत्पाद वह वस्तु या सेवा है जिसे कंपनी ग्राहकों को प्रदान करती है। इसमें उत्पाद की गुणवत्ता, डिज़ाइन, विशेषताएँ, ब्रांडिंग, पैकेजिंग और संबंधित सेवाएँ शामिल होती हैं। उत्पाद का उद्देश्य ग्राहक की आवश्यकताओं और इच्छाओं को पूरा करना और उन्हें संतुष्ट करना है।
(ii) मूल्य (Price) – मूल्य वह राशि है जो ग्राहक उत्पाद या सेवा के लिए भुगतान करता है। इसमें मूल्य निर्धारण की रणनीतियाँ जैसे लागत-प्लस मूल्य निर्धारण, मनोवैज्ञानिक मूल्य निर्धारण और प्रवेश मूल्य निर्धारण शामिल होती हैं। सही मूल्य तय करने से संगठन को लाभ मिलता है और ग्राहक आकर्षित होते हैं।
(iii) स्थान (Place) – यह वह स्थान है जहाँ उत्पाद या सेवा ग्राहकों तक पहुँचती है। इसमें भौतिक दुकानें, ई-कॉमर्स प्लेटफ़ॉर्म और वितरण चैनल शामिल हैं। अच्छी वितरण प्रणाली से उत्पाद सही समय और सही मात्रा में ग्राहकों तक पहुँचता है।
(iv) प्रचार (Promotion) – प्रचार के माध्यम से ग्राहकों को उत्पाद या सेवा के बारे में जागरूक किया जाता है। इसमें विज्ञापन, जनसंपर्क, व्यक्तिगत बिक्री और डिजिटल/सोशल मीडिया मार्केटिंग शामिल हैं। प्रभावी प्रचार बिक्री बढ़ाने और ब्रांड पहचान मजबूत करने में मदद करता है।
विपणन मिश्रण के विस्तारित 7 P (सेवा विपणन के लिए) :
(v) लोग (People) – यह उन कर्मचारियों को संदर्भित करता है जो उत्पाद या सेवा प्रदान करते हैं। कर्मचारियों का अनुभव, प्रशिक्षण और व्यवहार ग्राहक अनुभव को बेहतर बनाता है और संगठन की प्रतिष्ठा बढ़ाता है।
(vi) प्रक्रिया (Process) – इसमें सेवा प्रदान करने की पूरी प्रक्रिया शामिल होती है, जिससे ग्राहक सेवा तक पहुँचता है और उसका अनुभव करता है। सुव्यवस्थित प्रक्रिया सेवा की गुणवत्ता और संतोष सुनिश्चित करती है।
(vii) भौतिक प्रमाण (Physical Evidence) – यह उन भौतिक तत्वों को संदर्भित करता है जो ग्राहक अनुभव को प्रभावित करते हैं। इसमें सेवा प्रदाता की सुविधाएँ, वेबसाइट, उपकरण या किसी भी भौतिक संकेत शामिल हैं जो सेवा की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को दर्शाते हैं।
33. नियोजन से क्या तात्पर्य है? इसके महत्त्व को समझाइये।
उत्तर – नियोजन (Planning) का अर्थ है भविष्य के लिए लक्ष्य निर्धारित करना और उन्हें प्राप्त करने के लिए रणनीति तैयार करना। यह प्रबंध (Management) का पहला और आधारभूत कार्य है, जो संगठन की दिशा तय करता है और संसाधनों का सही, कुशल और प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करता है। नियोजन के बिना संगठन के प्रयास असंगठित और लक्ष्यहीन हो सकते हैं।
नियोजन का महत्त्व :
(i) संगठन को दिशा प्रदान करना – नियोजन संगठन को स्पष्ट दिशा और उद्देश्य प्रदान करता है। सभी गतिविधियाँ लक्ष्यों की प्राप्ति की ओर केंद्रित होती हैं, जिससे कर्मचारियों को कार्य में स्पष्टता और मार्गदर्शन मिलता है।
(ii) संसाधनों का सही उपयोग – नियोजन से मानव, भौतिक और वित्तीय संसाधनों का कुशल और व्यवस्थित उपयोग सुनिश्चित होता है। यह अपव्यय को कम करता है और संगठन को कम लागत में अधिकतम लाभ प्राप्त करने में मदद करता है।
(iii) जोखिम कम करना – नियोजन संभावित समस्याओं और अनिश्चितताओं की पहचान करने में मदद करता है। इसके द्वारा संगठन समय रहते रणनीति तैयार करता है और अप्रत्याशित परिस्थितियों से निपटने में सक्षम होता है।
(iv) निर्णय लेने में सुविधा – नियोजन प्रबंधकों को सही समय पर सही निर्णय लेने में सक्षम बनाता है। यह निर्णय प्रक्रिया को सरल, सुव्यवस्थित और उद्देश्यपूर्ण बनाता है।
(v) उत्पादकता और कार्य कुशलता बढ़ाना – नियोजन के माध्यम से कार्य व्यवस्थित और प्रभावी ढंग से संपन्न होते हैं। इससे कर्मचारियों की कार्य क्षमता बढ़ती है और संगठन की समग्र उत्पादकता में सुधार होता है।
(vi) भविष्य की तैयारी – नियोजन संगठन को भविष्य की चुनौतियों और अवसरों के लिए तैयार करता है। यह संगठन को प्रतिस्पर्धात्मक, सतत विकासशील और समय की मांगों के अनुसार तैयार रखता है।
अथवा
“नियोजन व्यवसाय की सफलता की गारंटी नहीं है।” इस कथन के सन्दर्भ में नियोजन की कोई छः सीमाएँ बताइए।
उत्तर – नियोजन की छः सीमाएँ (Limitations of Planning) :
(i) भविष्य की अनिश्चितता – नियोजन भविष्य की घटनाओं पर आधारित होता है, जो अनिश्चित और तेजी से बदलती हैं। इसलिए योजनाएँ कभी भी पूरी तरह सटीक नहीं हो सकतीं, और अप्रत्याशित परिस्थितियों में उनका प्रभाव सीमित हो जाता है।
(ii) कठोरता – नियोजन प्रबंधक को पूर्वनिर्धारित योजना के अनुसार काम करने पर मजबूर करता है। इससे वह नई या अप्रत्याशित परिस्थितियों के अनुसार त्वरित और लचीला निर्णय नहीं ले पाता, जो संगठन की दक्षता को प्रभावित कर सकता है।
(iii) महँगा – विस्तृत योजना बनाने के लिए विशेषज्ञ ज्ञान, डेटा संग्रह, विश्लेषण और समय की आवश्यकता होती है। यह प्रक्रिया संगठन के लिए महँगी हो सकती है, खासकर जब योजना बार-बार अपडेट की जाए।
(iv) नवाचार में बाधा – नियोजन प्रबंधक को एक निश्चित ढाँचे में बाँध देता है। इसका परिणाम यह होता है कि वह जोखिम लेने या नए विचारों को आजमाने से हिचकिचाता है, जिससे संगठन में नवाचार की संभावनाएँ कम हो जाती हैं।
(v) वास्तविकता से अलगाव – कभी-कभी योजना केवल सैद्धांतिक रूप में बनती है और जमीनी हकीकत को ध्यान में नहीं रखती। इससे योजनाएँ वास्तविक परिस्थितियों में लागू करने योग्य नहीं रहतीं और अप्रभावी साबित होती हैं।
(vi) बदलती परिस्थितियों के प्रति अनुपयोगी – एक बार योजना बन जाने के बाद उसे बदलने में समय और प्रयास लगता है। यदि बाहरी परिवेश तेजी से बदलता है, तो पुरानी योजना अनुपयोगी हो सकती है और संगठन की सफलता पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।
34. वैज्ञानिक प्रबंध से आप क्या समझते है? वैज्ञानिक प्रबंध के सिद्धान्तों को समझाइए।
उत्तर – वैज्ञानिक प्रबंध वह प्रणाली है जो कार्य करने के सर्वोत्तम तरीके को खोजने के लिए वैज्ञानिक विधियों (जैसे अवलोकन, मापन और प्रयोग) का उपयोग करती है। इसका मुख्य उद्देश्य न्यूनतम लागत पर अधिकतम उत्पादन प्राप्त करना और नियोक्ता तथा श्रमिक दोनों को लाभ पहुँचाना है। इसे Frederick W. Taylor ने विकसित किया और इसे टेलरवाद भी कहा जाता है। यह संगठन की कार्यकुशलता, उत्पादकता और आर्थिक दक्षता बढ़ाने में सहायक है।
वैज्ञानिक प्रबंध के सिद्धांत :
(i) कार्य का वैज्ञानिक अध्ययन – प्रत्येक कार्य को अनुमान या पारंपरिक तरीके के बजाय वैज्ञानिक विधियों से विश्लेषित करना। इसमें कार्य की प्रक्रिया, समय और संसाधनों का अध्ययन शामिल है, जिससे कार्यकुशलता बढ़ती है और उत्पादन अधिक होता है।
(ii) उपयुक्त चयन और प्रशिक्षण – कर्मचारियों को उनके कौशल, योग्यता और क्षमता के अनुसार चुना जाता है। इसके बाद उन्हें कार्य करने के वैज्ञानिक तरीके और तकनीक सिखाई जाती हैं, जिससे उनकी दक्षता और उत्पादन बढ़ता है।
(iii) कार्य और प्रबंधन का समान विभाजन – प्रबंधक योजना बनाता और कार्य प्रणाली विकसित करता है, जबकि कर्मचारी उस योजना के अनुसार कार्य करते हैं। इससे दोनों पक्षों के बीच जिम्मेदारी स्पष्ट होती है और कार्य सुचारू रूप से संपन्न होता है।
(iv) पूर्ण सहयोग – कर्मचारियों और प्रबंधन के बीच सहयोग और सौहार्दपूर्ण संबंध बनाए रखना। यह सुनिश्चित करता है कि दोनों पक्ष संगठन के लक्ष्यों के लिए मिलकर काम करें, जिससे संघर्ष कम होता है और कार्यकुशलता बढ़ती है।
(v) समान लाभ – कर्मचारियों को उनकी दक्षता और उत्पादकता के अनुसार उचित वेतन और प्रोत्साहन दिया जाता है। इससे उनका मनोबल बढ़ता है, वे अधिक मेहनत करते हैं और संगठन का उत्पादन और लाभ दोनों बढ़ते हैं।
(vi) अनुशासन और कार्य की निगरानी – वैज्ञानिक प्रबंध में कर्मचारियों के अनुशासन को बनाए रखना और कार्य की निगरानी करना आवश्यक है। यह सुनिश्चित करता है कि सभी कर्मचारी निर्धारित मानकों और समय सीमाओं के अनुसार कार्य करें। अनुशासन और निगरानी से कार्य में नियमितता आती है, त्रुटियाँ कम होती हैं और संगठन की दक्षता और उत्पादन में सुधार होता है।
अथवा
हेनरी फेयोल द्वारा दिए गए प्रबंध के निम्नलिखित सिद्धान्तों की संक्षेप में व्याख्या कीजिए :
(a) आदेश की एकता
उत्तर – इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक कर्मचारी को केवल एक ही वरिष्ठ या प्रबंधक से आदेश और निर्देश प्राप्त होने चाहिए। यदि किसी कर्मचारी को एक से अधिक प्रबंधकों से आदेश मिलते हैं, तो भ्रम, संघर्ष और जिम्मेदारी की समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जिससे अनुशासन और कार्यकुशलता प्रभावित होती है। उदाहरण के लिए, एक फैक्ट्री में किसी कर्मचारी को केवल एक फोरमैन से निर्देश मिलने चाहिए ताकि वह कार्य में भ्रमित न हो।
(b) सोपान श्रृंखला
उत्तर – यह सिद्धांत संगठन में उच्च से निम्न तक पदानुक्रमित अधिकार और औपचारिक संचार का मार्ग दर्शाता है। शीर्ष प्रबंधन से लेकर निचले स्तर तक आदेश और सूचना का प्रवाह सुव्यवस्थित रहता है, जिससे संगठन के विभिन्न स्तरों पर सुसंगत संचार और स्पष्ट अधिकार सुनिश्चित होते हैं। उदाहरण के लिए, किसी कर्मचारी को समस्या होने पर अपनी सोपान श्रृंखला में अगले वरिष्ठ को सूचित करना चाहिए, जो इसे उच्च प्रबंधन तक पहुँचाता है।
(c) निर्देश की एकता
उत्तर – इस सिद्धांत के अनुसार, एक ही उद्देश्य से संबंधित सभी गतिविधियों के लिए एक ही प्रबंधक और योजना होनी चाहिए। इससे यह सुनिश्चित होता है कि एक ही प्रकार के कार्य करने वाले सभी विभाग समान योजना और प्रबंधक के मार्गदर्शन में कार्य करें, जिससे संसाधनों का प्रभावी उपयोग और उचित समन्वय बना रहे। उदाहरण के लिए, किसी बिक्री विभाग की सभी गतिविधियों का निर्देशन एक ही बिक्री प्रबंधक द्वारा किया जाना चाहिए, ताकि उनके लक्ष्य और गतिविधियाँ एक ही योजना में संरेखित हों।