HBSE Class 9 Sanskrit Question Paper 2025 Answer Key

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HBSE Class 9 Sanskrit Question Paper 2025 Answer Key

खण्डः ‘क’
(अपठित-अवबोधनम्)

1. अधोलिखितं गद्यांशं पठित्वा प्रदत्तप्रश्नानाम् उत्तराणि यथानिर्देशं संस्कृतेन लिखत–
जीवने धनस्य अत्यधिकं महत्त्वम् अस्ति। धनेन जीवन निर्वाहः भवति। धनं विना वयं कथं भोजनम् अपि प्राप्तुं शक्नुमः? परन्तु यदि लोभेन वयं अन्धाः भूत्वा अधिकाधिकं धनं प्राप्तुम् इच्छामः, अनुचित साधनानां प्रयोगं कुर्मः, तर्हि तेन धनेन दुःखमेव भविष्यति। तस्य रक्षणे एव समयः व्यतीतः भवति। कोऽपि तद् हरिष्यति इति चिन्ता प्रतिक्षणं वर्धते। अभिमानः विवेकं नाशयति। त्यागेन एव धनस्य संरक्षणं भवति।
(अ) एकपदेन उत्तरत (केवलं प्रश्नद्वयम्)–
(i) जीवने कस्य अत्यधिकं महत्त्वम् अस्ति?
उत्तर – धनस्य

(ii) जीवन निर्वाहः केन भवति?
उत्तर – धनेन

(iii) कः विवेकं नाशयति?
उत्तर – अभिमानः

(ब) पूर्णवाक्येन उत्तरत (केवलं प्रश्नद्वयम्)–
(i) त्यागेन कस्य संरक्षणं भवति?
उत्तर – त्यागेन धनस्य संरक्षणं भवति।

(ii) प्रतिक्षणं का वर्धते?
उत्तर – कोऽपि थनं हरिष्यति इति चिन्ता प्रतिक्षणं वर्धते।

(iii) धनेन दुःखमेव कदा भविष्यति?
उत्तर – यदि वयं अनुचित साधनानां प्रयोगं कुर्मः तर्हि तेन धनेन दुःखमेव भविष्यति।

(स) अस्य अनुच्छेदस्य कृते उपयुक्तं शीर्षकं संस्कृतेन लिखत।
उत्तर – धनोपार्जनम्

(द) यथानिर्देशम् उत्तरत (केवलं प्रश्नत्रयम्)–
(क) ‘भवति’ पदे कः लकारः?
(i) लट् लकारः
(ii) लृट् लकारः
(iii) लङ् लकारः
(iv) लोट् लकारः
उत्तर – (i) लट् लकारः

(ख) ‘अत्यधिकं’ अस्य पदस्य सन्धि विच्छेदपदं किम्?
(i) अति + अधिकं
(ii) अत्य + धिकं
(iii) अत्या + अधिकं
(iv) अती + अधिकं
उत्तर – (i) अति + अधिकं

(ग) ‘त्यागेन’ अस्मिन् पदे का विभक्तिः अस्ति?
(i) प्रथमा
(ii) तृतीया
(iii) चतुर्थी
(iv) द्वितीया
उत्तर – (ii) तृतीया

(घ) ‘भूत्वा’ इत्यस्मिन् पदे कः प्रत्ययः?
(i) ल्यप्
(ii) क्त
(iii) क्त्वा
(iv) तुमुन्
उत्तर – (iii) क्त्वा

खण्डः ‘ख’
(रचनात्मक-कार्यम्)

2. (क) भवान् रामः। विद्यालयस्य वार्षिकोत्सवः इति विषये मित्रं देवं प्रति लिखितं पत्रं मञ्जूषाप्रदत्तैः पदैः पूरयित्वा लिखत–
परीक्षाभवनम्
प्रिय मित्र देवः,
सप्रेम नमस्ते।
अत्र (1) …………. तत्रास्तु। अहं निज विद्यालयस्य वार्षिकोत्सवस्य (2) …………. करोमि। सप्ताहपूर्वम् एव विद्यालये सर्वे (3) …………. छात्राः च वार्षिकोत्सवस्य कार्येषु व्यस्ताः आसन्। हरियाणा राज्यस्य शिक्षा निदेशकः (4) ………….. अध्यक्षः आसीत्। सः कार्यक्रमम् अतीव प्राशंसत्, योग्येभ्यः (5) …………… पारितोषिकान् अयच्छत्।
भवतः प्रियः
रामः
[मञ्जूषा– कुशलं, अध्यापकाः, वर्णनं, छात्रेभ्यः, कार्यक्रमस्य]
उत्तर – (1) कुशलं, (2) वर्णनं, (3) अध्यापकाः, (4) कार्यक्रमस्य, (5) छात्रेभ्यः

(ख) निर्दिष्टचित्रं दृष्ट्वा मञ्जूषायां प्रदत्तशब्दैः उचितरिक्तस्थानानि पूरयित्वा लिखत–

[मञ्जूषा– रात्रौ, निर्मलम्, खगाः, विविधाः, चित्रं]
(क) इदं ………….. नदीतटस्य वर्तते।
उत्तर – चित्रं

(ख) तटे …………. वृक्षाः सन्ति।
उत्तर – विविधाः

(ग) वृक्षेषु ………….. इतस्ततः तिष्ठन्ति।
उत्तर – खगाः

(घ) नद्याः जलं ……………. वर्तते।
उत्तर – निर्मलम्

(ङ) खगाः ……………. नीडेषु निवसन्ति।
उत्तर – रात्रौ

खण्डः ‘ग’
(पठित-अवबोधनम्)

3. निम्नलिखितं गद्यांशं पठित्वा हिन्दीभाषया सप्रसङ्गसरलार्थं लिखत–
(क) पुरा कस्मिंश्चिद् ग्रामे एका निर्धना वृद्धा स्त्री न्यवसत्। तस्याः च एका दुहिता विनम्रा मनोहरा चासीत्। एकदा माता स्थाल्यां तण्डुलान् निक्षिप्य पुत्रीम् आदिशत्। “सूर्यातपे तण्डुलान् खगेभ्यो रक्ष।” किञ्चित् कालादनन्तरम् एको विचित्रः काकः समुट्ठीय तस्याः समीपम् आगच्छत्।
उत्तर – प्रसंग : प्रस्तुत गद्यांश पाठ 2 “स्वर्णकाक” से लिया गया है। इस गद्यांश में एक निर्धन वृद्धा स्त्री और उसकी गुणवान पुत्री की कथा का वर्णन है। इसमें माता द्वारा अपनी पुत्री को दिए गए कार्य का उल्लेख किया गया है तथा आगे घटित होने वाली घटना का प्रारम्भिक संकेत मिलता है। यह गद्यांश कथा की भूमिका प्रस्तुत करता है।
• सरलार्थ : किसी समय किसी गाँव में एक निर्धन वृद्धा स्त्री रहती थी। उसकी एक बेटी थी, जो स्वभाव से विनम्र और अत्यन्त सुंदर थी। एक दिन माता ने एक बर्तन में चावल डालकर अपनी पुत्री को आदेश दिया कि वह उन्हें धूप में रखे और पक्षियों से उनकी रक्षा करे। कुछ समय बाद एक विचित्र काक (कौआ) उड़ता हुआ वहाँ आया और उस लड़की के पास आकर बैठ गया।

अथवा

(ख) तस्य च गृहे लौहघटिता पूर्व पुरुषोपार्जिता तुला आसीत्। तां च कस्यचित् श्रेष्ठिनो गृहे निक्षेपभूतां कृत्वा देशान्तरं प्रस्थितः। ततः सुचिरं कालं देशान्तरं यथेच्छया भ्रान्त्वा पुनः स्वपुरम् आगत्य तं श्रेष्ठिनम् अवदत् – “भोः श्रेष्ठिन् ! दीयतां मे सा निक्षेपतुला।” सोऽवदत् “भोः नास्ति सा, त्वदीया तुला मूषकैः भक्षिता” इति।
उत्तर – प्रसंग : प्रस्तुत गद्यांश पाठ 6 “लौहतुला” से लिया गया है। यह गद्यांश एक नैतिक कथा पर आधारित है। इसमें एक व्यक्ति और एक सेठ के बीच रखी गई धरोहर का उल्लेख है तथा सेठ द्वारा की गई बेईमानी का वर्णन किया गया है। यह कथा ईमानदारी और न्याय का संदेश देती है।
• सरलार्थ : उस व्यक्ति के घर में लोहे से बनी एक तराजू थी, जो उसे अपने पूर्वजों से प्राप्त हुई थी। वह व्यक्ति उस तराजू को किसी सेठ के घर धरोहर के रूप में रखकर दूसरे देश चला गया। बहुत समय तक इच्छानुसार विभिन्न स्थानों पर घूमने के बाद वह पुनः अपने नगर लौटा और उस सेठ से बोला “हे सेठ! मेरी वह धरोहर रूपी तराजू मुझे लौटा दीजिए।” तब सेठ ने उत्तर दिया “हे महाशय! वह तराजू अब नहीं है, आपकी तराजू को चूहों ने खा लिया है।”

4. अधोलिखितश्लोकस्य हिन्दीभाषया सप्रसङ्गसरलार्थ लिखत–
(क) प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्माद् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता।।
उत्तर – प्रसंग : प्रस्तुत श्लोक पाठ 4 “सूक्तिमौक्तिकम्” से लिया गया है। यह श्लोक नीति-शिक्षा से संबंधित है, जिसमें मधुर एवं प्रिय वचनों के महत्त्व को स्पष्ट किया गया है तथा यह बताया गया है कि स्नेहपूर्ण वाणी से मनुष्य दूसरों का हृदय जीत सकता है।
• सरलार्थ : मधुर और प्रिय वचन बोलने से सभी प्राणी संतुष्ट और प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिए मनुष्य को सदैव वही बात कहनी चाहिए जो दूसरों को अच्छी लगे, क्योंकि ऐसे वचन बोलने में न कोई हानि होती है और न ही किसी प्रकार की कमी।

अथवा

(ख) वृद्धोऽहं त्वं युवा धन्वी सरथः कवची शरी।
न चाप्यादाय कुशली वैदेही में गमिष्यसि।।
उत्तर – प्रसंग : प्रस्तुत श्लोक पाठ 8 “जटायोः शौर्यम्” से लिया गया है। यह श्लोक रामायण से उद्धृत है। इसमें सीता के अपहरण के समय जटायु द्वारा रावण को रोके जाने तथा उसे धर्म का स्मरण कराते हुए चेतावनी देने का वर्णन किया गया है।
• सरलार्थ : जटायु रावण से कहता है मैं वृद्ध हूँ और तुम युवा हो। तुम धनुष धारण किए हुए हो, रथ पर सवार हो तथा कवच पहने हुए हो, जबकि मैं निःशस्त्र हूँ। इसके बावजूद तुम सीता को लेकर कुशलपूर्वक नहीं जा सकोगे।

5. अधोलिखितासु सूक्तिषु मात्र द्वयोः सूक्त्योः भावार्थं हिन्दीभाषया लिखत–
(क) परोपकाराय सतां विभूतयः।
उत्तर – इस सूक्ति का भावार्थ यह है कि सज्जन और श्रेष्ठ व्यक्ति अपनी संपत्ति, शक्ति और सामर्थ्य का उपयोग केवल अपने लिए नहीं करते। वे इन सबका प्रयोग दूसरों की भलाई, समाज के कल्याण और जनहित के कार्यों में करते हैं, यही उनकी सच्ची महानता होती है।

(ख) क्षिप्रमक्रियमाणस्य कालः पिबति तद्रसम्।
उत्तर – इस सूक्ति का आशय यह है कि जो व्यक्ति समय रहते अपना कार्य नहीं करता, उसके परिश्रम का फल समय के साथ नष्ट हो जाता है। इसलिए आलस्य और टालमटोल से बचकर कार्य को समय पर करना आवश्यक है, तभी सफलता प्राप्त होती है।

(ग) “भवता धृतोत्पतिरहस्यम् व्याख्यातम्।।”
उत्तर – इस वाक्य का भावार्थ यह है कि आपके द्वारा धृतराष्ट्र के जन्म से जुड़े रहस्य को विस्तारपूर्वक और स्पष्ट रूप में समझाया गया है। आपकी व्याख्या से उस विषय की सभी शंकाएँ दूर हो गई हैं।

अथवा

अधोलिखितश्लोकस्य अन्वयं मञ्जूषातः उचित पदानि चित्वा पूरयत–
श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।।
अन्वयः –
(1) ……….. श्रूयतां श्रुत्वा च एव (2) …………
आत्मनः (3) …..…….. परेषां नं (4) …………
[मञ्जूषा– समाचरेत्, प्रतिकूलानि, धर्मसर्वस्वं, अवधार्यताम्]
उत्तर – (1) धर्मसर्वस्वं, (2) अवधार्यताम्, (3) प्रतिकूलानि, (4) समाचरेत्

6. अधः प्रदत्तं गद्यांशं पठित्वा प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतेन पूर्णवाक्येन लिखत (केवलं प्रश्नत्रयम्)–
अत एव अस्माभिः प्रकृतिः रक्षणीया। तेन च पर्यावरणं रक्षितं भविष्यति। प्राचीनकाले लोकमङ्गलाशंसिन ऋषयो वने निवसन्ति स्म। यतो हि वने सुरक्षितं पर्यावरणमुपलभ्यते स्म। तत्र विविधा विहगाः कलकूजिश्रोत्ररसायनं ददाति।
प्रश्नाः –
(क) लोकमङ्गलाशंसिनः ऋषयः कुत्र निवसन्ति?
उत्तर – लोकमङ्गलाशंसिनः ऋषयः वने निवसन्ति।

(ख) वने सुरक्षितं किम् उपलभ्यते स्म?
उत्तर – वने सुरक्षितं पर्यावरणम् उपलभ्यते स्म।

(ग) ‘भविष्यति’ पदे कः लकारः?
उत्तर – लृट् लकारः

(घ) लोकमङ्गलाशंसिन ऋषयः अनयोः विशेषणं पदं किम्?
उत्तर – लोकमङ्गलाशंसिन

7. निम्नलिखितंश्लोकं पठित्वा प्रदत्तप्रश्नानामुत्तराणि संस्कृतेन पूर्णवाक्येन लिखत (केवलं प्रश्नद्वयम्)–
वृत्तं यत्नेन संरक्षेद् वित्तमेति च याति च।
अक्षीणो वित्ततः क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः।।
प्रश्नाः –
(क) यत्नेन किं रक्षेत्?
उत्तर – यत्नेन वृत्तं रक्षेत्।

(ख) किम् एति च याति च?
उत्तर – वित्तम् एति च याति च।

(ग) ‘यत्नेन’ पदे का विभक्ति?
उत्तर – तृतीया विभक्ति।

8. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य कोष्ठकात् चित्वा प्रश्ननिर्माणं कुरुत (केवलं प्रश्नत्रयम्)–
(क) मध्यमानस्य दध्नः अणिमा ऊर्ध्वं समुदीषति। (कस्य, कः)
उत्तर – कस्य

(ख) तपोदत्तः तपश्चर्यया विद्यामवाप्तुं प्रवृत्तीऽस्ति। (कया, कस्मै)
उत्तर – कया

(ग) वनवृक्षाः निर्विवेकं द्यिदन्ते। (के, कस्मात्)
उत्तर – के

(घ) कुक्कुरः मानुषाणां मित्रम् अस्ति। (केषां, कस्मै)
उत्तर – केषां

(ङ) जीर्णधनः विभवक्षयात् देशान्तरं गन्तुमिच्छन् व्यचिन्तयत्। (कः, कस्मिन्)
उत्तर – कः

9. प्रश्नपत्रे लिखित श्लोकान् विहाय ‘शेमुषी भाग-1’ पुस्तकाद् एकं कण्ठस्थं श्लोकं संस्कृतभाषया लिखत।
उत्तर – पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः
स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः।
नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः
परोपकाराय सतां विभूतयः।।

खण्डः ‘घ’
(अनुप्रयुक्त-व्याकरणम्)

10. (क) स्वरसन्धेः अथवा अयादिसन्धेः परिभाषां हिन्दीभाषया उदाहरणञ्च संस्कृतभाषया लिखत।
उत्तर – स्वर संधि : दो स्वरों के मेल से होने वाले विकार (परिवर्तन) को स्वर-संधि कहते हैं। उदाहरण: हिम + आलय = हिमालय
• अयादि संधि : यदि ए, ऐ, ओ और औ के बाद कोई भिन्न स्वर आए तो ‘ए’ का ‘अय्’, ‘ऐ’ का ‘आय्’, ‘ओ’ का ‘अव्’ एवं ‘औ’ का ‘आव्’ हो जाता है। उदाहरण: ने + अन = नयन

(ख) अव्ययीभावसमासस्य अथवा द्विगुसमासस्य परिभाषां हिन्दीभाषया उदाहरणञ्च संस्कृतभाषया लिखत।
उत्तर – अव्ययीभाव समास : वह समास है जिसमें पहला पद अव्यय होता है और वही प्रधान होता है। इससे बना समस्त पद अव्यय के रूप में प्रयुक्त होता है और उसका रूप नहीं बदलता है। जैसे: प्रतिदिन, यथाशक्ति।
• द्विगु समास : वह समास है जिसमें पहला पद संख्या-वाचक होता है और समस्त पद किसी समूह या परिमाण का बोध कराता है। जैसे: चौराहा (चार राहों का समूह), त्रिलोक (तीनों लोकों का समाहार)।

(ग) करणकारकस्य अथवा अपादानकारकस्य परिभाषां हिन्दीभाषया उदाहरणञ्च संस्कृतभाषया लिखत।
उत्तर – करण कारक : वह कारक है जो क्रिया करने के साधन या माध्यम को दर्शाता है, जिसके द्वारा कोई कार्य संपन्न होता है। इसके मुख्य विभक्ति-चिह्न ‘से’ और ‘के द्वारा’ होते हैं। जैसे: वह कलम से लिखता है। (यहाँ कलम करण कारक है, क्योंकि यह लिखने की क्रिया का साधन है।)
• अपादान कारक : वह कारक है जो संज्ञा या सर्वनाम के उस रूप को दर्शाता है जिससे किसी वस्तु का अलग होना, निकलना, डरना, सीखना, लजाना या तुलना का भाव प्रकट होता है। इसका विभक्ति-चिह्न ‘से’ होता है, पर यह करण कारक के ‘से’ से भिन्न है, क्योंकि इसमें अलगाव का अर्थ प्रमुख होता है। जैसे: पेड़ से आम गिरते हैं। (यहाँ आम पेड़ से अलग हो रहे हैं)

11. यथानिर्दिष्टानि शब्दरूपाणि लिखत (केवलं प्रश्नचतुष्ट्यम्)–
(क) ‘देव’ शब्दस्य चतुर्थी – एकवचने
उत्तर – देवाय

(ख) ‘फलम्’ शब्दस्य प्रथमा – बहुवचने
उत्तर – फलानि

(ग) ‘साधु’ शब्दस्य तृतीया – द्विवचने
उत्तर – साधुभ्याम्

(घ) ‘मुनि’ शब्दस्य षष्ठी – बहुवचने
उत्तर – मुनीनाम्

(ङ) ‘किम्’ (पु०) द्वितीया – एकवचने
उत्तर – कम्

(च) ‘लता’ शब्दस्य पंचमी – द्विवचने
उत्तर – लताभ्याम्

12. यथानिर्दिष्टानि धातुरूपाणि लिखत (केवलं प्रश्नचतुष्ट्यम्)–
(क) ‘भू’ धातोः लट् लकारस्य प्रथमपुरुष – एकवचने
उत्तर – भवति

(ख) ‘पठ्’ धातोः लृट् लकारस्य मध्यमपुरुष – द्विवचने
उत्तर – पठिष्यथः

(ग) ‘स्था’ (तिष्ठ) धातोः लोट् लकारस्य उत्तमपुरुष – बहुवचने
उत्तर – तिष्ठाम

(घ) ‘गम्’ धातोः लङ् लकारस्य प्रथमपुरुष – एकवचने
उत्तर – अगच्छत्

(ङ) ‘लिख्’ धातोः विधिलिङ्ग लकारस्य मध्यमपुरुष – द्विवचने
उत्तर – लिखेतम्

(च) ‘लभ्’ धातोः लट् लकारस्य प्रथमपुरुष – एकवचने
उत्तर – लभते

13. प्रदत्तोपपदविभक्ति वाक्येषु उचितविभक्तिं कोष्ठकात् चित्वा लिखत (केवलं प्रश्नत्रयम्)–
(क) ………….. पत्राणि पतन्ति। (वृक्षात्, वृक्षेण)
उत्तर – वृक्षात्

(ख) अलम् …………. (कोलाहलेन, कोलाहलं)
उत्तर – कोलाहलेन

(ग) …………. उभयत वृक्षाः सन्ति। (नगरं, नगरस्य)
उत्तर – नगरं

(घ) ………….. नमः। (शिवं, शिवाय)
उत्तर – शिवाय

(ङ) बालकः ………….. बिभेति। (सिंहात्, सिंहः)
उत्तर – सिंहात्

14. निम्नक्रियापदेभ्यः उपसर्गान् पृथक् कृत्वा लिखत (केवलं प्रश्नद्वयम्)–
(क) प्रतिभाति
उत्तर – प्रति

(ख) वितरन्ति
उत्तर – वि

(ग) उपगता
उत्तर – उप

खण्डः ‘ङ’
(पाठाधारिताः बहुविकल्पीयाः प्रश्नाः)

15. अधोनिर्दिष्टेषु प्रश्नेषु प्रदत्तवैकल्पिक चतुर्भ्य: उत्तरेभ्यः एकं शुद्धम् उत्तरं चित्वा लिखत–
(क) ‘नीरसः’ इत्यस्य विलोमपदं किम्?
(i) सरसः
(ii) नवीनम्
(iii) आम्रम्
(iv) कटुः
उत्तर – (i) सरसः

(ख) ‘आम्रम्’ इत्यस्य पदस्य पर्यायपदं किम्?
(ⅰ) रसालः
(ii) तरुः
(iii) पत्रम्
(iv) पृथ्वीम्
उत्तर – (i) रसालः

(ग) ‘समीरः’ इत्यस्य पदस्य पर्यायपदं किम्?
(i) पवनः
(ii) जलम्
(iii) अग्निः
(iv) अम्बुः
उत्तर – (i) पवनः

(घ) ‘सूर्योदयः’ इत्यस्य पदस्य विलोमपदं किम्?
(i) सूर्यास्तः
(ii) सर्वोदयः
(iii) सूर्य उदयः
(iv) सूयोर्दयः
उत्तर – (i) सूर्यास्तः

(ङ) ‘दृश् + क्त्वा’ इत्यस्य संयोगे किं रूपम्?
(i) द्रष्ट्वा
(ii) दृशत्वा
(iii) दृष्ट्वा
(iv) दशयित्वा
उत्तर – (iii) दृष्ट्वा

(च) ‘विज्ञातुम्’ इत्यस्मिन् पदेः कः प्रत्ययः?
(i) शतृ
(ii) शानच्
(iii) क्त्वा
(iv) तुमुन्
उत्तर – (iv) तुमुन्

(छ) ‘न + इच्छामि’ इत्यत्र किं सन्धिपदम्?
(i) नोच्छामि
(ii) नेच्छामि
(iii) निच्छामि
(iv) न इच्छामि
उत्तर – (ii) नेच्छामि

(ज) ‘मासान्ते’ इत्यत्र कः सन्धि विच्छेदः?
(i) मास + अन्ते
(ii) मास + न्ते
(iii) मासा + अन्ते
(iv) मास + आन्ते
उत्तर – (i) मास + अन्ते

(झ) ‘जन्तवः’ केन तुष्यन्ति?
(i) कटुवाक्यप्रदानेन
(ii) प्रियवाक्यप्रदानेन
(iii) प्रिय मित्रेण
(iv) प्रियफलेन
उत्तर – (ii) प्रियवाक्यप्रदानेन

(ञ) ‘पंचवटी’ इत्यस्मिन् पदे कः समासः?
(i) द्विगु समासः
(ii) कर्मधारय समासः
(iii) द्वन्द्व समासः
(iv) बहुव्रीहि समासः
उत्तर – (i) द्विगु समासः

(ट) ‘जलप्रवाहे’ इत्यस्य पदस्य विग्रहपदं किंम्?
(i) जलं प्रवाहं
(ii) जले प्रवाहे
(iii) जलस्य प्रवाहे
(iv) जलात् प्रवाहे
उत्तर – (iii) जलस्य प्रवाहे

(ठ) ‘षण्णवतिः’ इत्यस्मिन् पदे का संख्या?
(i) 60
(ii) 90
(iii) 96
(iv) 95
उत्तर – (iii) 96

(ड) ’75’ अङ्कस्थाने किं संख्यावाचीपदम्?
(i) पञ्चाशीतिः
(ii) पञ्चषष्टिः
(iii) पञ्चनवतिः
(iv) पञ्चसप्ततिः
उत्तर – (iv) पञ्चसप्ततिः

(ढ) ‘प्रीतः बालकः’ अत्र किं विशेषणपदम्?
(i) बालकः
(ii) प्रीतः
(iii) भ्रमितः
(iv) प्रीतः बालकः
उत्तर – (ii) प्रीतः

(ण) ‘लुब्धा वृद्धा’ अत्र किं विशेष्यपदम्?
(i) लुब्धा
(ii) वृद्धा
(iii) लुब्धा वृद्धा
(iv) लुब्धायाः
उत्तर – (ii) वृद्धा

घटिकां दृष्ट्वा समयेन रिक्तस्थानं संस्कृत पदेन पूरयत–
(त) बालकः प्रातः …………. वादने उतिष्ठति।

(i) पञ्च
(ii) सप्त
(iii) षड्
(iv) अष्ट
उत्तर – (iii) षड्

(थ) अहं सायं ………….. गृहं गच्छामि।

(i) पंचवादने
(ii) सप्तवादने
(iii) नववादने
(iv) द्वादशवादने
उत्तर – (i) पंचवादने