HBSE 12th Political Science Solved Sample Paper 2023

HBSE 12th Political Science Solved Sample Paper 2023 

 

 

Q1.(i) निम्नलिखित में से किसे पुलिस कार्यवाही द्वारा पुर्तगालियों से मुक्त करवाया गया था। 

      (A) पांडिचेरी

      (B) कारगिल

      (C) गोवा

      (D) कश्मीर

 

(ii) चीन ने भारत पर कब आक्रमण किया?

      (A) सन् 1962 में

      (B) सन् 1965 में

      (C) सन् 1971 में

      (D) सन् 1975 में

 

(iii) कांग्रेस पार्टी द्वारा ‘गरीबी हटाओ’ का नारा किस वर्ष के लोकसभा चुनाव में दिया गया?

      (A) सन् 1967

      (B) सन् 1977

      (C) सन् 1971

      (D) सन् 1980

 

(iv) भाषा के आधार पर पंजाब राज्य का पुनर्गठन कब हुआ?

      (A) 1960 में

      (B) 1966 में

      (C) 1972 में

      (D) 1984 में

 

(v) यूरोपीय संघ के झण्डे में कितने सितारे हैं?

      (A) 8

      (B) 10

      (C) 12

      (D) 15

 

(vi) अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का मुख्यालय कहाँ पर स्थित है?

      (A) जेनेवा में

      (B) न्यूयॉर्क में

      (C) पेरिस में

      (D) वाशिंगटन में 

 

(vii) भारत के प्रथम चुनाव आयुक्त कौन थे?

सुकुमार सेन, पश्चिम बंगाल (1950 से 1958)

 

(viii) आन्तरिक आपातकाल की घोषणा किस प्रधानमंत्री के काल में हुई ?

इन्दिरा गांधी 

 

(ix) जून, 1984 में पंजाब में कौन-सा ऑपरेशन चलाया गया था? 

आपरेशन ब्लू स्टार 

 

(x) भारत में धर्म के आधार पर गठित किन्ही दो दलों के नाम लिखिए। 

मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा 

 

(xi) N.D.A (रा० ज० ग०)  का पूर्ण रूप लिखिए।

National Democratic Alliance (राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन)

 

(xii) पेंटागन अमेरिका में क्या है?

पेंटगान, अमेरिका का रक्षा मुख्यालय या प्रतिरक्षा विभाग है और यह वाशिंगटन में स्थित है।

 

(xiii) कच्चाटीवू द्विप विवाद किन दो देशों के मध्य है?

भारत और श्रीलंका 

 

(xiv) अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का कोई एक कार्य लिखिए। 

यह मजदूरों तथा श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए नियम बनाता है। 

 

(xv) विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थापना किस वर्ष हुई? 

1995 में 

 

(xvi) विश्व व्यापी जुड़ाव का अर्थ किस भावना से है?

विश्व व्यापी जुड़ाव का अर्थ एकता की भावना से है। 

 

Q2. एक दलीय प्रभुत्व का क्या अर्थ है? 

एक दलीय प्रभुत्व का अर्थ है एक ही सरकार या एक ही पार्टी का दबदबा होना, इसके अंतर्गत दूसरे दलों को मान्यता नहीं दी जाती। एक दलीय प्रभुत्व से तात्पर्य उस राजनीतिक व्यवस्था से है, जहाँ केवल एक दल का ही प्रभुत्व होता है। 

 

Q3. गुट-निरपेक्षता का क्या अर्थ है?

किसी विवाद के सन्दर्भ में यह जानते हुए कि कौन सही है और कौन गलत है किसी का पक्ष नहीं लेना तटस्थता है किन्तु गुट-निरपेक्षता का आशय सही और गलत में विभेद करते हुए सदैव सही का समर्थन करना है। 

 

Q4. भारत की विदेश नीति के कोई दो लक्षण लिखिए। 

भारत की विदेश नीति के दो लक्षण निम्नलिखित है –

(i) असंलग्नता की नीति भारतीय विदेश नीति की प्रमुख विशेषता है। 

(ii) प्रत्येक राष्ट्र एक-दूसरे के साथ समानता का व्यवहार करे तथा पारस्परिक हित में सहयोग करे।

(iii) शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति का सभी राष्ट्र पालन करें।

 

Q5. ‘प्रेस सेंसरशिप’ किसे कहा जाता है?

जब किसी राजनीतिक दल द्वारा किसी विशेष जानकारी अथवा सूचना को जन समुदाय तक पहुंचने से रोका अथवा प्रतिबंधित किया जाता है, तो इस घटना को प्रेस सेंसरशिप कहा जाता है। 

 

Q6. ‘क्षेत्रवाद’ से आपका क्या अभिप्राय है? 

क्षेत्रवाद या क्षेत्रीयता एक क्षेत्र-विशेष में निवास करने वाले लोगों के अपने क्षेत्र के प्रति वह विशेष लगाव व अपने (अपनेपन) की भावना है जिसे कि कुछ सामान्य आदर्श, व्यवहार, विचार तथा विश्वास के रूप में अभिव्यक्त किया जाता है। क्षेत्रवाद के अर्थ में हम कह सकते हैं कि एक देश में या देश के किसी भाग में निवास करने वाला, लोगों के छोटे समूह से है जो आर्थिक, भौगोलिक, सामाजिक आदि कारणों से अपने पृथक अस्तित्व के लिए जागरूक हो। साधारण से अर्थ में क्षेत्रवाद किसी क्षेत्र के लोगों की उस भावना व प्रयत्नों से है जिनके द्वारा वे अपने क्षेत्र विशेष के लिए आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक हितों में वृद्धि चाहते हैं। 

 

Q7. ‘द्वि-ध्रुवीय’ विश्व के पतन से आप क्या समझते है? 

लगभग सम्पूर्ण विश्व इन दो गुटों में था। इसलिए विश्व को द्वि-ध्रुवीय कहा जाता था, परंतु 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो जाने से विश्व का एक ध्रुव समाप्त हो गया। इसी को द्वि-ध्रुवीय विश्व का पतन कहा जाता है।

अमेरिकी गुट में फूट-द्वि-ध्रुवीय विश्व के पतन का एक प्रमुख कारण अमेरिकी गुट में फूट पड़ना था। फ्रांस तथा इंग्लैंड जैसे देश अमेरिका पर अविश्वास करने लगे थे।  

 

Q8. सोवियत प्रणाली की कोई दो विशेषताएँ लिखिए। 

सोवियत प्रणाली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित है – 

(i) सोवियत आर्थिक प्रणाली योजनाबद्ध एवं राज्य के नियन्त्रण में थी। 

(ii) सोवियत संघ में सम्पत्ति पर राज्य का स्वामित्व एवं नियन्त्रण था। 

(iii) सोवियत संघ की संचार प्रणाली बहुत उन्नत थी। इसके दूर-दराज के क्षेत्र भी आवागमन की सुव्यवस्थित एवं विशाल प्रणाली के कारण आपस में जुड़े हुए थे।

 

Q9. यूरोपीय संघ की स्थापना कब और किस संधि द्वारा हुई? 

यूरोपीय संघ की स्थापना 1 नवंबर 1993 में हुई। यह संगठन यूरोप में राजनीतिक और आर्थिक एकीकरण की भावना से ‘मास्ट्रिच संधि’ द्वारा बनाया गया। 

 

Q10. संयुक्त राष्ट्र संघ के ‘महासचिव’ का चुनाव कैसे होता है? आजकल इस पद पर कौन कार्य कर रहा है? 

संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव की नियुक्ति राष्ट्र मंत्रिपरिषद की सिफारिशों पर महासभा द्वारा की जाती है। इसकी नियुक्ति सुरक्षा परिषद की संस्तुति पर महासभा द्वारा 5 वर्ष के लिए की जाती है। वह दुबारा भी चुना जा सकता है। एंटोनियो गुटेरेस इस पद पर कार्य कर रहे है।   

 

Q11. निर्जन वन क्षेत्र क्या है?

निर्जन वन से आशय इस प्रकार के वनों से है जिसमें मनुष्य एवं जानवर नहीं पाये जाते हैं। उत्तरी गोलार्द्ध के कई देशों में निर्जन वन पाये जाते हैं। इस गोलार्द्ध के देशों में वन को निर्जन प्रान्त के रूप में देखा जाता है जहाँ पर लोग नहीं रहते हैं। इस प्रकार का दृष्टिकोण मनुष्य को प्रकृति के एक अंग के रूप में स्वीकार नहीं करता है। 

 

Q12. स्वतंत्र भारत के सम्मुख उपस्थित किन्ही चार चुनौतियों का वर्णन कीजिए। 

स्वतंत्रता के बाद भारत के सामने उपस्थित विभिन्न चुनौतियाँ –

(i) विभाजन – विभाजन को बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा के रूप में चिह्नित किया गया था। इसके अलावा विभाजन के कारण ही कश्मीर समस्या की उत्पत्ति हुई और उसके परिणामस्वरूप पाकिस्तान के साथ युद्ध भी हुआ। साथ ही भारत को बड़ी संख्या में शरणार्थियों को पुनर्वास प्रदान करने की आवश्यकता थी।

(ii) बड़े पैमाने पर गरीबी और निरक्षरता – स्वतंत्रता के समय भारत में लगभग 80% या लगभग 250 मिलियन आबादी गरीब थी। अकाल और भूख ने भारत को अपनी खाद्य सुरक्षा के लिये बाहरी मदद लेने हेतु प्रेरित किया।

(iii) विविधता में एकता सुनिश्चित करना – एक नए स्वतंत्र भारत जिसे मुख्य रूप से रियासतों को आत्मसात करने से उत्पन्न चुनौतियों के कारण देश की एकता और संप्रभुता को बनाए रखने की आवश्यकता थी। ब्रिटिश भारतीय प्रांतों की सीमाओं को सांस्कृतिक और भाषाई एकता के बारे में सोचे बिना बेतरतीब ढंग से खींचा गया था।

(iv) कम आर्थिक क्षमता – भारत में स्थिर कृषि और निम्न औद्योगिक आधार जैसी समस्याएं मौजूद थीं। वर्ष 1947 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का 54% हिस्सा था। स्वतंत्रता के समय भारत की 60% जनसंख्या जीविका के लिए कृषि पर निर्भर थी।

(v) शीत-युद्ध तनाव – अधिकांश विकासशील देश संयुक्त राज्य अमेरिका या सोवियत संघ की दो महाशक्तियों में से किसी एक से जुड़े हुए थे। भारत ने शीत युद्ध की राजनीति से दूर रहने और इसके आंतरिक विकास पर ध्यान केंद्रित करने के लिये गुटनिरपेक्षता की नीति का पालन किया।

 

Q13. विकास के किन्ही चार उद्देश्यों का वर्णन कीजिए।

विकास के निम्नलिखित उद्देश्य होते हैं –

(i) न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति – विकास का प्रथम महत्त्वपूर्ण लक्ष्य गरीब जनता की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। चिकित्सा सुविधाएं, स्वास्थ्य, पेयजल, कपड़ा, मकान, भोजन आदि आवश्यक पदार्थों की सुविधाएं आम जनता को दी जाएंगी।

(ii) गरीबी व बेरोज़गारी को दूर करना – पिछड़े तथा विकासशील देशों का एक महत्त्वपूर्ण लक्ष्य आर्थिक पुनर्निर्माण करके गरीबी तथा बेरोज़गारी को दूर करना है। विकसित देश भी बेरोज़गारी की समस्या को हल करने के लिए प्रयास कर रहे हैं।

(iii) प्राकृतिक साधनों का विकास – विकासशील देशों का लक्ष्य प्राकृतिक साधनों का शोषण करके देश का आर्थिक विकास करना है।

(iv) विकास की ऊंची दर – आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए आर्थिक विकास की ऊंची दर को प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके लिए यह आवश्यक है कि राष्ट्रीय आय तथा शुद्ध प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि की जाए।

(v) आत्म-निर्भरता – अल्पविकसित तथा विकासशील देशों का लक्ष्य अपने देश को आत्म-निर्भर बनाना है।

(vi) समाज कल्याण के कार्य – विकासशील देश लोगों के आर्थिक तथा समाज कल्याण के कार्यों को निम्न स्तर के लोगों तक पहुंचाने का लक्ष्य रखते हैं। गरीब वर्गों और विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए सरकार को भारी निवेश का रास्ता अपनाना पड़ेगा। विश्व के अनेक देशों में बेरोजगारी भत्ता (Unemployment Allowance) दिया जाता है। विश्व के अनेक विकसित देशों में बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता, नि:शुल्क तथा अनिवार्य प्राइमरी शिक्षा, वृद्धों को पेंशन इत्यादि अनेक सुविधाएं दी गई हैं और विकासशील देश इन सुविधाओं को देने का प्रयास कर रहे हैं।

(vii) लोकतन्त्रीय पद्धति से विकास – लोकतन्त्र पद्धति के द्वारा ही विकास कार्य किए जाने चाहिए। लोकतन्त्र विकास का विरोधी नहीं है। यह ठीक है कि अधिनायकवादी देशों में विकास की गति तीव्र होती है और अधिनायक विकास की जो दिशा तय करता है उसी दिशा में विकास होता है।

 

Q14. 1960 के दशक को एक ‘खतरनाक–दशक’ क्यों कहा जाता है? 

1960 के दशक को ‘खतरनाक’ दशक इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इस दशक में भारत को कई पक्षों से समस्याओं का सामना करना पड़ा। राजनीतिक स्तर पर पं० जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु तथा 1966 में उनके उत्तराधिकारी श्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु भारत के लिए अपूर्णनीय क्षति थी। इसके साथ-साथ इस दशक में भारत को दो युद्धों का सामना करना पड़ा। 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया तथा 1965 में पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण किया। इसी दशक में भारत में भारी खाद्यान्न संकट पैदा हुआ। इसी दशक में भारत में गरीबी, असमानता, साम्प्रदायिकता तथा क्षेत्रीय विवाद भी अनसुलझे थे। इसके अतिरिक्त 1969 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का विभाजन हो गया। इसीलिए 1960 के दशक को खतरनाक दशक कहा जाता है। 

 

Q15. भारतीय समाज में महिलाओं की निम्न स्थिति के कोई चार कारणों का उल्लेख कीजिए।  

भारतीय समाज में महिलाओं की निम्न स्थिति के निम्नलिखित कारण हैं – 

(i) आर्थिक निर्भरता – स्त्रियों को अपने भरण-पोषण के लिए पुरुषों पर निर्भर रहना पड़ता था। स्त्रियों को घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर नौकरी, व्यवसाय या अन्य साधन द्वारा धन कमाने की आज्ञा नहीं थी। आर्थिक निर्भरता के कारण पुरुषों की प्रभुता उन पर हावी थी और उन्हें पुरुषों के अधीन रहना पड़ता था। पुरुषों पर आश्रित होने के कारण ही उनकी समाज में परिस्थिति नीची थी। 

(ii) अशिक्षा  – प्राचीन काल में स्त्री शिक्षा का कम प्रचलन था। अशिक्षा और अज्ञानता के कारण स्त्रियों में अन्धविश्वास, कुरीतियाँ और रूढ़िवादिता का बोलबाला था। अशिक्षित नारी को अपने अधिकारों का ज्ञान नहीं था। वह पति को परमेश्वर मानकर उसका शोषण और अन्याय सहते हुए निम्न स्तर का जीवन-यापन करने के लिए विवश थी। 

(iii) बाल-विवाह – प्राचीन काल में भारत में बाल-विवाहों का प्रचलन था। बाल-विवाहों के कारण बाल-विधवाओं की संख्या बढ़ गयी। बाल-विधवाओं का जीवन दयनीय था। वे समाज पर भार थीं। बाल-विवाह पद्धति ने नारी की समाज में परिस्थिति नीची बना दी। 

(iv) पुरुष-प्रधान समाज – प्राचीन भारतीय समाज पुरुष-प्रधान था। पुरुष स्त्री को अपने नियन्त्रण में रखने तथा उसे अपने से नीचा समझने की प्रवृत्ति रखता था। पुरुष के इस अहम् भाव ने भी समाज में नारी की परिस्थिति को नीचा बना दिया। 

 

Q16. गठबंधन सरकार के किन्ही चार लक्षणों का वर्णन कीजिए। 

गठबंधन सरकार (मिलीजुली सरकारों) के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं – 

(i) गठबंधन सरकार में कम-से-कम दो दल भागीदार होते हैं।

(ii) भागीदार दल गठबंधन की राजनीति को कुछ प्राप्त करने के लिए अपनाते हैं। लक्ष्य सारभूत रूप में कुछ प्राप्ति का हो सकता है या मनोवैज्ञानिक रूप में प्राप्ति का। 

(iii) गठबंधन एक अस्थायी प्रबंध होता है।

(iv) गठबंधन सरकार का गठन समझौते के आधार पर होता है। इसमें कठोर सिद्धांतवादी राजनीति के लिए कोई स्थान नहीं होता है अर्थात् मिलीजुली सरकारें यथार्थवाद पर आधारित होती हैं।

 

(v) गठबंधन का प्रत्येक प्रमुख भागीदार दल अपनी राजनीतिक शक्ति में वृद्धि कर अकेले ही सत्ता प्राप्त करने की इच्छा रखता है।

 

Q17. नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की आवश्यकता के किन्हीं चार कारणों का उल्लेख कीजिए। 

नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की जोरदार मांग का प्रादुर्भाव, युद्धोत्तर काल की अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में गम्भीर तथा महान् परिवर्तनों के कारण हुआ। पहले-पहल यूरोप की दुर्बल व्यवस्था, दो महाशक्तियों का उदय, शीत युद्ध का प्रादुर्भाव, साम्राज्यवाद विरोधी तथा उपनिवेशवाद विरोधी आन्दोलन, उपनिवेशों को समाप्त करने की तेज प्रक्रिया का प्रादुर्भाव आदि विश्व के राजनीतिक मानचित्रों में तेजी से होने वाले परिवर्तन ऐसे परिवर्तनों के लिए उत्तरदायी बने। बाद में एशिया, अफ्रीका तथा लैटिन अमरीका में उदय होने वाले नए राज्यों में नई जागृति का प्रादुर्भाव तथा इसका विस्तार, यूरोपीय राष्ट्रों द्वारा आर्थिक सुधार, भारत तथा ब्राजील जैसे स्थानीय तिमिंगलो का उत्थान, (भूतपूर्व) सोवियत संघ तथा अमरीका के बीच सीधे टकराव से सीमित टकराव की स्थिति में परिवर्तन तथा बहुत से अन्य कारणों से, अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में नए आर्थिक निर्णय सामने आए। नए राज्यों- तृतीय विश्व द्वारा सामाजिक-आर्थिक विकास में तथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में उचित भूमिका निभाने की वचनबद्धता ने भी अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में बहुत परिवर्तन उत्पन्न कर दिया। 1970 के दशक के प्रारम्भ में अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में आर्थिक विषय ही प्रमुख विषय बन गये थे। लगभग इसी समय अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में एक नई प्रकार की स्थिति पैदा हो गई थी। इसने शीत युद्ध काल के तथाकथित आदेशों की विचारधारा के महत्व को नगण्य कर दिया तथा विकास तथा अविकास के आर्थिक आधारों पर ध्यान केन्द्रित किया। ऐसे समय में पूर्व के समाजवादी तथा पश्चिम के पूँजीवादी देशों के बीच विरोध का स्तान एक ओर भूतपूर्व उपनिवेशीय एवं अविकसित दक्षिणी गोलार्द्ध के निर्धन देशों अर्थात् तृतीय विश्व तथा दूसरी ओर उत्तरी गोलार्द्ध के तकनीकी तथा आर्थिक रूप से विकसित साधन सम्पन्न देशों अर्थात् दो विकसित देशों के बीच विरोध ने ले लिया। इस तरह नई आर्थिक जागृति तथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के कारण विकसित तथा कम-विकसित देशों के बीच विरोध, दोनों ने मिलकर नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यव्यवस्था के दृष्टिकोण से उत्तर-दक्षिण विरोध का रूप धारण कर लिया।

 

Q18. सोवियत संघ के विघटन के कोई चार कारण लिखिए। 

सोवियत संघ के विघटन के कारण निम्नलिखित हैं – 

(i) साम्यवादी तानाशाही – सोवियत संघ में एक ही राजनीतिक दल यानि साम्यवादी दल था और इस दल के अलावा कोई अन्य दल स्थापित नहीं किया जा सकता था और न ही कोई उस दल की आलोचना कर सकता था, अर्थात एक ही शक्तिशाली दल होने की वजह से शासन ने अपनी शक्तियों का दुरूपयोग करना आरम्भ कर दिया। सोवियत संघ के नागरिकों के पास कोई भी मौलिक अधिकार नहीं थे और इस वजह से नागरिक राजनीतिक रूप से अंदर ही अंदर शासन के विरुद्ध होने लगे। सोवियत संघ के नागरिकों को अपने विचारों को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता भी प्राप्त नहीं थी उनके विचारों में लगातार नियंत्रण की वजह से नागरिकों में क्रोध उत्पन्न होने लगा। इसके अलावा नागरिक शासन के कार्यों में भी भागीदारी नहीं ले सकते थे वे केवल शासन की बनाई गई नीतियों पर ही कार्य कर सकते थे। धीरे-धीरे इन सभी विपरीत स्थितियों ने बड़ा रूप धारण कर लिया जो सोवियत संघ के विघटन का प्रमुख कारण था। 

(ii) गिरती हुई अर्थव्यवस्था – 70 के दशक के अंत तक सोवियत संघ का सकल घरेलु उत्पाद बहुत कम होने लगा था अर्थात सोवियत संघ की विकास दर बहुत कम हो गई। सोवियत संघ के कृषि एवं औद्योगिक उत्पादन में तेजी से गिरावट आने लगी तथा जिन वस्तुओं का सोवियत संघ निर्यात करता था अब उसे वे सब आयात करना पड़ रहा था। साम्यवादी देशों को आर्थिक एवं सैन्य रूप से सहायता करने का बोझ सोवियत संघ पर ही था। इसके अलावा सोवियत संघ का एकमात्र लक्ष्य पश्चिमी देशों से आगे निकलना था। जिसकी वजह से उसने अंधाधुंध सैन्य खर्च किए। अंततः इन सभी कारणों की वजह से सोवियत संघ का विघटन हो गया।

(iii) अन्य देशों के साथ प्रतिस्पर्धा – सोवियत संघ की सबसे बड़ी गलती यह रही की उसने स्वयं सुरक्षित रखने की अपेक्षा दूसरे देशों के साथ प्रतिस्पर्धा करना आरंभ कर दिया उसने शस्त्रों एवं अंतरिक्ष अनुसंधानों में इतना अधिक धन व्यय किया की वह कुछ समय पश्चात स्वयं ही कमजोर पड़ गया। इसके अलावा जो सोवियत संघ सबसे अधिक शक्तिशाली हुआ करता था 80 के दशक में आने तक वह पश्चिमी देशों से सूचना एवं तकनीकी के क्षेत्र में बहुत पिछड़ गया था और यह खबर संपूर्ण नागरिकों व विश्व में फ़ैल गई, अंततः सोवियत संघ का विघटन हो गया।

 

(iv) नौकरशाही का बोलबाला – नौकरशाही व स्थाई कर्मचारी या अधिकारी होते हैं जो सरकार के लिए कार्यरत होते हैं। इन कर्मचारी एवं अधिकारियों को सरकारी नीतियों को नागरिकों में लागू करने का अधिकार प्राप्त था परन्तु कुछ समय बाद यह अधिकारी गैर जिम्मेदार होने लगे वे अपनी जिम्मेदारियों, कर्तव्यों एवं नागरिकों के प्रति पूरी तरह से गैर जिम्मेदार होने लगे और अंत में लोगों के बीच भी अधिकारियों और शासन के प्रति क्रोध तो उत्पन्न हुआ ही साथ में सोवियत संघ प्रशासन में भ्रष्टाचार ने बहुत बड़ा रूप धारण कर लिया था, यही वजह सोवियत संघ के विघटन का कारण था।

 

Q19. भारत तथा पाकिस्तान द्वारा जारी किये गये लाहौर घोषणा-पत्र की मुख्य बातें क्या थी?

लाहौर घोषणा पत्र 1999 की मुख्य बातें –

(i) नियमित अंतराल पर दोनों देशों के विदेश मंत्री बैठक करेंगे और आपसी हितों के मुद्दे पर चर्चा करेंगे। 

(ii) विश्व व्यापार से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श की सहमति। 

(iii) वीज़ा नियमों को आसान बनाना, युद्धबंदियों या असैनिक बंदियों की जाँच के लिए मंत्रीस्तर पर दो सदस्यीय समिति का गठन। 

(iv) सुरक्षा धारणाओं और परमाणु सिद्धांतों पर विचार विमर्श करेंगे। 

(v) मिसाइल उड्डयन परीक्षणों की पूर्व सूचना देना। 

(vi) परमाणु ख़तरों को कम करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर क़दम उठाएँगे। 

(vii) पहले न्यूक्लियर टेस्ट न करने के वादे का पालन करेंगे। 

(viii) UN चार्टर के सिद्धांतों और लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्धता निभाएंगे। 

 

(ix) आपसी विश्वास के लिए समय समय पर विचार-विमर्श।

 

Q20. सुरक्षा परिषद् के संगठन, शक्तियों एवं कार्यों का वर्णन कीजिए। 

सयुक्त राष्ट्र संघ का सबसे शक्तिशाली अंग सुरक्षा परिषद् है। इससे कुल 15 सदस्य है इसमें पांच स्थायी सदस्य (अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन) तथा दस अस्थायी सदस्य है जो दो वर्षों की अवधि के लिए चुने जाते है। स्थायी सदस्यों को वीटो (निषेधाधिकार) की शक्ति प्राप्त है। सुरक्षा परिषद् में सदस्यता प्रदान करते समय महासभा अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा में उस राष्ट्र के योगदान को भी ध्यान में रखती है।

सुरक्षा परिषद् की शक्तियाँ –

(i) यह अन्तर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा से संबंधित निर्णय लेती है।

(ii) यह झगड़ों का निर्णय करती है और यदि उचित समझती है तो किसी भी देश के विरुद्ध शक्ति प्रयोग कर सकती है।

(iii) यह महासभा के संयोग से नए सदस्य, महासचिव एवं अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीशों का चुनाव करती है।

(iv) यह किसी देश द्वारा भेजी गई शिकायत पर विचार करती है और उसका निपटारा करती है। 

सुरक्षा परिषद के कार्य – 

(i) विश्व शान्ति तथा सुरक्षा के प्रति उत्तरदायी होती है। ये विरोधी देशों को बाध्य करती है कि वे विवाद का निपटारा शान्तिपूर्ण तरीकों से करें।

(ii) सुरक्षा परिषद के क्षेत्राधिकार में आने वाले बहुत से संगठनात्मक विषयों में उसे कानूनी रूप से बाध्यकारी अधिकार प्राप्त है, नए राष्ट्रों को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता प्रदान करना, महासचिव का चयन, अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति आदि सभी ऐसे कार्य जो महासभा से मिलकर करती है। बाध्यकारी प्रमाण रखते हैं।

(iii) सुरक्षा परिषद अपने आन्तरिक मामलों का स्वयं निर्णय करती है।

(iv) सुरक्षा परिषद शान्ति भंग करने वाले किसी भी देश के विरुद्ध कठोर कार्यवाही कर सकती है।

(v) यदि किसी राष्ट्र ने दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण कर दिया है तो सुरक्षा परिषद को कूटनीतिक, आर्थिक तथा सैनिक कार्यवाही करने का आदेश देने का अधिकार है तथा सदस्य राष्ट्र चार्टर की इच्छानुसार उक्त निर्णय को मानने तथा लागू करने को बाध्य है।।

 

(vi) सुरक्षा परिषद की सिफारिश पर कोई भी राष्ट्र जिसके खिलाफ अनुशासन की कार्यवाही की गयी हो, सदस्यता के अधिकार से अनिश्चित काल के लिए वंचित किया जा सकता है।

                                         अथवा 

‘मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा’ के आधार पर मानव अधिकारों का वर्णन कीजिए। 

मानवाधिकार का सीधा सा अभिप्राय है- मानव + अधिकार अर्थात् मानव के अधिकार। इस प्रकार मानवाधिकार वे अधिकार हैं जो कि सभी लोगों को मानव होने के नाते प्राप्त होने ही चाहिए। एक मानव के रूप में हर आदमी विशिष्ट है और उसका समान महत्व है। मानवाधिकार इसी धारणा पर आधारित हैं। अतः एक मानव होने के नाते हमें जो भी आवश्यक स्थितियाँ, वस्तुएँ इत्यादि मिलनी चाहिए उन्हें ही मानवाधिकार कहा जाता है। इस घोषणा के परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ ने 10 दिसम्बर 1948 को मानवाधिकार की सार्वभौमिक घोषणा अंगीकार की। 

मानवाधिकारो का वर्णन – 

(i) सब लोग गरिमा और अधिकार के मामले में स्वतंत्र बराबर के हक़दार हैं। 

(ii) प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के सभी प्रकार के अधिकार और स्वतंत्रता दी गई है। नस्ल, रंग, लिंग, भाषा, धर्म, राजनीतिक या अन्य विचार, राष्ट्रीयता या सामाजिक उत्पत्ति, सम्पत्ति, जन्म आदि जैसी बातों पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता। 

(iii) प्रत्येक व्यक्ति को जीवन, आजादी और दैहिक सुरक्षा का अधिकार। 

(iv) किसी भी व्यक्ति को यातना नहीं दी जाएगी या उसके साथ क्रूर, अमानवीय एवं अपमानजनक व्यवहार नहीं किया जाएगा या उसे ऐसा दण्ड नहीं दिया जाएगा। 

(v) कानून के सामने समानता का अधिकार। 

(vi) कानून के सामने सभी को समान संरक्षण का अधिकार, अपने बचाव में इंसाफ के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने का अधिकार। 

(vii) मनमाने ढंग से की गई गिरफ्तारी, हिरासत में रखने या निर्वासन से आजादी का अधिकार। 

(viii) किसी स्वतंत्रता के जरिए निष्पक्ष व सार्वजनिक सुनवाई का अधिकार। 

(ix) जब तक अदालत दोषी करार नहीं देती उस वक्त तक निर्दोष होने का अधिकार।  

(x) प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्येक राज्य की सीमाओं के भीतर संचरण और निवास की स्वतंत्रता का अधिकार है, प्रत्येक व्यक्ति को अपने देश को या किसी भी देश को छोड़ने और अपने देश में वापस आने का अधिकार है। 

(xi) प्रत्येक व्यक्ति को उत्पीड़न के कारण अन्य देशों से शरण माँगने और लेने का अधिकार है। इस अधिकार का अवलम्ब अराजनैतिक अपराधों का संयुक्त राष्ट्र के प्रयोजनों और सिद्धान्तों के प्रतिकूल कार्यों से वास्तविक रूप से उद्भूत अभियोजनाओं की दशा में नहीं लिया जा सकेगा। राष्ट्रीयता का अधिकार किसी भी व्यक्ति को मनमाने ढंग से न तो उसकी राष्ट्रीयता से और न राष्ट्रीयता परिवर्तित करने के अधिकार से वंचित किया जाएगा। 

(xii) वयस्क पुरुषों और स्त्रियों को मूलवंश, राष्ट्रीयता या धर्म के कारण किसी भी सीमा के बिना विवाह करने और कुटुम्ब स्थापित करने का पूर्ण अधिकार है। वे विवाह के विषय में, विवाहित जीवनकाल में और उसके विघटन पर समान अधिकारों के हकदार हैं। 

(xiii) प्रत्येक व्यक्ति को अकेले या अन्य व्यक्तियों के साथ मिलकर सम्पत्ति का स्वामी बनने का अधिकार है। किसी को भी उसकी सम्पत्ति से मनमाने ढंग से वंचित नहीं किया जाएगा। प्रत्येक व्यक्ति को विचार, अन्तःकरण और धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार है। 

(xiv) प्रत्येक व्यक्ति को अभिमत और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। 

(xv) प्रत्येक व्यक्ति को शांतिपूर्वक सम्मिलन और संगम की स्वतंत्रता है। 

(xvi) सरकार बनाने की गतिविधियों में हिस्सा लेने और सरकार चुनने का अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को अपनी देश की लोक सेवा में समान पहुँच का अधिकार है। 

(xvii) प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे जीवन स्तर का अधिकार है, जो स्वयं उसके और उसके कुटुम्ब के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए पर्याप्त है। इसके अन्तर्गत भोजन, वस्त्र, मकान और चिकित्सा तथा आवश्यक सामाजिक सेवाएं भी हैं और बेरोजगारी, रुग्णता, असक्तता, वैधव्य, वृद्धावस्था या उसके नियंत्रण के बाहर परिस्थितियों में जीवनयापन के अभाव की दशा में सुरक्षा का अधिकार है। 

(xviii) शिक्षा का अधिकार कम-से-कम प्राथमिक और मौलिक स्तर पर शिक्षा निःशुल्क होगी। 

 

(xix) प्रत्येक व्यक्ति को समुदाय के सांस्कृतिक जीवन में मुक्त रूप से भाग लेने का अधिकार है।

 

Q21. पर्यावरण प्रदूषण के मुख्य आम प्रभावों का वर्णन कीजिए। 

पर्यावरण-प्रदूषण का सामान्य अर्थ है-हमारे पर्यावरण का दूषित हो जाना। पर्यावरण का निर्माण प्रकृति ने किया है। प्रकृति-प्रदत्त पर्यावरण में जब किन्ही तत्त्वों का अनुपात इस रूप में बदलने लगती है जिसका जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना होती है, तब कहा जाता है कि वातावरण प्रदूषित हो रहा है। उदाहरण के लिए-यदि पर्यावरण के मुख्य भाग वायु में ऑक्सीजन के स्थान पर अन्य विषैली गैसों का अनुपात बढ़ जाये तो कहा जाएगा कि वायु-प्रदूषण हो गया है। वातावरण के किसी भी भाग के दूषित हो जाने को पर्यावरण-प्रदूषण कहा जाएगा। यह प्रदूषण जल-प्रदूषण, मृदा-प्रदूषण, वायु-प्रदूषण तथा ध्वनि-प्रदूषण के रूप में हो सकता है। 

पर्यावरण प्रदूषण के प्रभाव –

(i) जन-स्वास्थ्य पर प्रभाव – पर्यावरण-प्रदूषण का सर्वाधिक प्रतिकूल प्रभाव जन-स्वास्थ्य पर पड़ता है। जैसे-जैसे पर्यावरण का अधिक प्रदूषण होने लगता है, वैसे-वैसे प्रदूषण जनित रोगों की दर एवं गम्भीरता में वृद्धि होने लगती है। पर्यावरण के भिन्न-भिन्न पक्षों में होने वाले प्रदूषण से भिन्न-भिन्न प्रकार के रोग बढ़ते हैं। हम जानते हैं कि वायु प्रदूषण के परिणामस्वरूप श्वसन-तन्त्र से सम्बन्धित रोग अधिक प्रबल होते हैं। जल-प्रदूषण के परिणामस्वरूप पाचन-तन्त्र से सम्बन्धित रोग अधिक फैलते हैं। ध्वनि-प्रदूषण भी तन्त्रिकी-तन्त्र, हृदय एवं रक्तचाप सम्बन्धी विकारों को जन्म देता है। इसके साथ-ही-साथ मानसिक स्वास्थ्य एवं व्यवहारगत सामान्यता को ध्वनि-प्रदूषण विकृत कर देता है। अन्य प्रकार के प्रदूषण भी जन-सामान्य को विभिन्न सामान्य एवं गम्भीर रोगों का शिकार बनाते हैं। संक्षेप में कहा जा सकता है कि पर्यावरण-प्रदूषण अनिवार्य रूप से जन-स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। प्रदूषित पर्यावरण में रहने वाले व्यक्तियों की औसत आयु भी घटती है तथा स्वास्थ्य का सामान्य स्तर भी निम्न रहता है। 

(ii) व्यक्तिगत कार्यक्षमता पर प्रभाव – व्यक्ति एवं समाज की प्रगति में सम्बन्धित व्यक्तियों की कार्यक्षमता का विशेष महत्त्व होता है। यदि व्यक्ति की कार्यक्षमता सामान्य या सामान्य से अधिक हो, तो वह व्यक्ति निश्चित रूप से प्रगति के मार्ग पर अग्रसर होता है तथा समृद्ध बन सकता है। जहाँ तक पर्यावरण-प्रदूषण का प्रश्न है, इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति की कार्यक्षमता अनिवार्य रूप से घटती है। हम जानते हैं कि पर्यावरण-प्रदूषण के परिणामस्वरूप जन-स्वास्थ्य का स्तर निम्न होता है। निम्न स्वास्थ्य स्तर वाला व्यक्ति न तो अपने कार्य को कुशलतापूर्वक कर सकती है और न ही उसकी उत्पादन-क्षमता सामान्य रह पाती है। ये दोनों ही स्थितियाँ व्यक्ति एवं समाज के लिए हानिकारक सिद्ध होती हैं। वास्तव में प्रदूषित वातावरण में भले ही व्यक्ति अस्वस्थ न भी हो, तो भी उसकी चुस्ती एवं फूर्ति तो घट ही जाती है। यही कारक व्यक्ति की कार्यक्षमता को घटाने के लिए पर्याप्त होता है।

 

(iii) आर्थिक जीवन पर प्रभाव – व्यक्ति, समाज तथा राष्ट्र की आर्थिक स्थिति पर भी पर्यावरण प्रदूषण का उल्लेखनीय प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। वास्तव में यदि व्यक्ति के स्वास्थ्य का स्तर निम्न हो तथा उसकी कार्यक्षमता भी कम हो, तो वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समुचित धन कदापि अर्जित नहीं कर सकता। पर्यावरण-प्रदूषण के परिणामस्वरूप व्यक्ति की उत्पादन क्षमता घट जाती है। इसके साथ-ही-साथ यह भी सत्य है कि यदि व्यक्ति अथवा उसके परिवार का कोई सदस्य प्रदूषण का शिकार होकर किन्हीं साधारण या गम्भीर रोगों से ग्रस्त रहता है तो उसके उपचार पर भी पर्याप्त व्यय करना पड़ सकता है। इससे भी व्यक्ति एवं परिवार का बजट बिगड़ जाता है तथा व्यक्ति एवं परिवार की आर्थिक स्थिति निम्न हो जाती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि पर्यावरण-प्रदूषण के प्रभाव से व्यक्ति की आर्थिक स्थिति प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों ही रूपों में कुप्रभावित होती है। इस कारक के प्रबल तथा विस्तृत हो जाने पर समाज एवं राष्ट्र की आर्थिक स्थिति भी प्रभावित होती है। 

                                             अथवा 

वैश्वीकरण का क्या अर्थ है? वैश्वीकरण के मुख्य उद्देश्यों का वर्णन कीजिए। 

देश की अर्थव्यवस्था को विश्व की अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत करना ही वैश्वीकरण (Globalization) कहलाता है। स्थानीय या क्षेत्रीय वस्तुओं या घटनाओं का विश्व स्तर पर रूपांतरण होने की प्रक्रिया ही वैश्वीकरण (Globalization) है। वैश्वीकरण, दुनिया भर में लोगों, कंपनियों और सरकारों के बीच परस्पर क्रिया और एकीकरण की प्रक्रिया है। विश्व स्तर पर क्षेत्रीय वस्तुओं या घटनाओं के रूपांतरण की प्रक्रिया को वैश्वीकरण के नाम से जाना जाता है। वैश्वीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं तकनीकी ताकतों का संयोजन होता है।

वैश्वीकरण (Globalization) विभिन्न देशों के लोगों, कंपनियों और सरकारों के बीच बातचीत और एकीकरण की प्रक्रिया है। वैश्वीकरण में संपूर्ण विश्व को एक बाजार का रूप प्रदान किया जाता है। वैश्वीकरण से आशय विश्व अर्थव्यवस्था में आये खुलेपन, बढ़ती हुई आत्मनिर्भरता तथा आर्थिक एकीकरण के फैलाव से है। इसके अंतर्गत विश्व बाजारों के मध्य पारस्परिक निर्भरता उत्पन्न होती है। व्यवसाय देश की सीमाओं को पार करके विश्वव्यापी रूप धारण कर लेते हैं। वैश्वीकरण के द्वारा ऐसे प्रयास किए जाते है कि विश्व के सभी देश व्यवसाय एवं उद्योग के क्षेत्र में एक दूसरे के साथ सहयोग एवं समन्वय स्थापित करें। एक व्यक्तिगत स्तर पर, वैश्वीकरण जीवन के मानक और जीवन की गुणवत्ता दोनों को प्रभावित करता है। 

वैश्वीकरण के मुख्य उद्देश्य – 

(i) आर्थिक समानता – वैश्वीकरण के प्रमुख उद्देश्य होता है देश में फ़ैली आर्थिक असमानताओं को दूर करना ताकि इन आर्थिक असमानताओं को दूर कर अल्पविकसित और विकासशील देशों को विकसित देशों के श्रेणी में लाया जा सके।

(ii) विकास हेतु नवीन साझेदारी करना – वैश्वीकरण में यही प्रयास होता है कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नई संधियाँ और नए संगठनों के साथ देश की अर्थव्यवस्था में सर्वत्र विकास की राह सुनिश्चित की जाए।

(iii) विश्वबंधुत्व की भावना का विकास करना – वैश्वीकरण के बहाने विश्वबंधुत्व की भावना का विकास होता है। यदि देश मे प्राकृतिक या अप्राकृतिक विप्पति आ जाए तो शेष विश्व के देशों का यथासंभव भरपूर आर्थिक और मानवीय सहयोग प्राप्त होता है। इस उद्देश्य होते हैं जिनके कारण विश्व के अनेक देश वैश्वीकरण को स्वीकार करते हैं।

 

(iv) अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग – विश्व के सदस्य देशों का अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग पाना भी एक उद्देश्य होता है। व्यापारिक संबंध बनाए रखने हेतु किसी देश द्वारा अन्य देशों के लिए अपने स्तर पर सहयोग देना सीमा के अंदर अनुमति देना भी वैश्वीकरण के एक उदाहरण है। उदाहरण के लिए, अन्य देशों तक पहुंचायी जाने वाली गैस पाइप लाइन को पाकिस्तान ने अपने क्षेत्र से होकर जाने की अनुमति दी है।

 

 

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